मोदी सरकार का एजेण्डा नम्बर 1 – रहे-सहे श्रम क़ानूनों की धज्जियाँ उड़ाना

August 6, 2014

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2014

मोदी सरकार ने देशी-विदेशी लुटेरों के लिए “अच्छे दिन” लाने के अपने वादे को निभाने के लिए उनकी राह में सबसे बड़ी बाधा, यानी देश में मज़दूरों के अधिकारों की थोड़ी-बहुत हिफ़ाज़त करने वाले श्रम क़ानूनों को भी किनारे लगाने की शुरुआत कर दी है। करीब 25 वर्ष पहले जब उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को बड़े पैमाने पर लागू करने की शुरुआत हुई तभी से पूँजीपतियों की संस्थाएँ और उनके भाड़े के क़लमघसीट पत्रकार और अर्थशास्त्री चीख़-पुकार मचा रहे हैं कि श्रम क़ानून पुराने पड़ गये हैं और उन्हें बदल देने का वक़्त आ गया है। इस पूरे दौर में टुकड़े-टुकड़े में श्रम क़ानूनों को बदलने और कमज़ोर करने का सिलसिला जारी रहा है और मज़दूरों के पक्ष में जो कुछ बचे-खुचे क़ानून रह गये हैं वे भी सिर्फ़ काग़ज़ पर ही हैं। देश के 93 प्रतिशत मज़दूरों के लिए उनका कोई मतलब नहीं रह गया है।

श्रम क़ानूनों को लागू करवाने वाली संस्थाओं को एक-एक करके इतना कमज़ोर और लचर बना दिया गया है कि क़ानून के खुले उल्लंघन पर भी वे कुछ नहीं कर सकतीं। लेकिन इतने से भी पूँजीपतियों को सन्तोष नहीं है। वे चाहते हैं कि मज़दूरों को पूरी तरह से उनके रहमो-करम पर छोड़ दिया जाये। जब जिसे चाहे मनमानी शर्तों पर काम पर रखें, जब चाहे निकाल बाहर करें, जैसे चाहे वैसे मज़दूरों को निचोड़ें, उनके किसी क़दम का न मज़दूर विरोध कर सकें और न ही कोई सरकारी विभाग उनकी निगरानी करे। कुल मिलाकर, श्रम “सुधारों” का उनके लिए यही मतलब है। अगर सरकारें अब तक उनकी यह इच्छा पूरी नहीं कर पायी हैं और श्रम क़ानूनों के कुछ चिथड़े बचे रह गये हैं तो केवल इसलिए कि ट्रेड यूनियनों और नक़ली वामपन्थियों की ग़द्दारी के बावजूद देशभर के मज़दूर अपने अधिकारों के लिए बार-बार लड़ते रहे हैं। लेकिन अब देश के सारे बड़े लुटेरों ने मिलकर मोदी सरकार बनवायी इसीलिए है ताकि वह हर विरोध को कुचलकर मेहनत की नंगी लूट के लिए रास्ता बिल्कुल साफ़ कर दे। अपने को ‘मज़दूर नम्बर 1’ बताने वाला नरेन्द्र मोदी फ़ौरन इस काम में जुट गया है।

केन्द्रीय बजट 2014-2015 के कुछ ही दिन पहले सरकार ने संसद में कहा कि वह पुराने पड़ चुके कारख़ाना अधिनियम, 1948 को बदलने वाली है। श्रम मामलों के राज्य मन्त्री विष्णु देव ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में बताया कि प्रस्तावित संशोधनों में कारख़ानों में महिलाओं की रात की ड्यूटी पर पाबन्दियों को ढीला करना और एक तिमाही में ओवरटाइम की सीमा को 50 घण्टे से बढ़ाकर 100 घण्टे करना शामिल है। हालाँकि हर कोई जानता है कि अभी ज़्यादातर कारख़ानों में मज़दूरों को हर सप्ताह 24 से लेकर 48 घण्टे तक ओवरटाइम करना पड़ता है, और उसके लिए भी उन्हें ओवरटाइम की दर से मज़दूरी न देकर सिंगल रेट पर दी जाती है। अधिकांश प्राइवेट कम्पनियों में दफ्तरों के कर्मचारी भी रोज़ कई घण्टे ज़बरन ओवरटाइम करते हैं। जब क़ानून ही ढीला कर दिया जायेगा तो समझा जा सकता है कि मालिक किस क़दर मज़दूरों और कर्मचारियों को निचोड़ेंगे।

श्रम क़ानूनों को पूँजीपतियों के हक़ में बदलने की शुरुआत मोदी सरकार बनते ही राजस्थान की वसुन्धरा राजे सरकार ने कर दी थी। राजस्थान की भाजपा सरकार ने फैक्टरी एक्ट 1948, इण्डस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 और ठेका क़ानून 1971 को संशोधित करके श्रम क़ानूनों पर हमला बोलने की शुरुआत कर दी है। इन संशोधनों में कम्पनियों को मनचाहे तरीके से मज़दूरों को निकालने से लेकर कई तरह की छूटें दी गयी हैं और मज़दूरों के अधिकारों में और कटौती की गयी है। श्रम क़ानून अभी केन्द्र सरकार का विषय है, लेकिन मोदी सरकार के रहते राजस्थान के संशोधनों को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने में कोई बाधा नहीं आने वाली है। बल्कि राजस्थान द्वारा किये गये संशोधन केन्द्र सरकार के लिए एक मॉडल का काम करने वाले हैं। फैक्टरी एक्ट के लागू होने की शर्त के रूप में अब मज़दूरों की संख्या को दोगुना कर दिया है। अभी तक फैक्टरी एक्ट 10 या इससे ज़्यादा मज़दूरों (जहाँ बिजली का इस्तेमाल होता हो) तथा 20 या इससे ज़्यादा मज़दूरों (जहाँ बिजली का इस्तेमाल न होता हो) वाली फैक्टरियों पर लागू होता था। अब इसे क्रमशः 20 और 40 मज़दूर कर दिया गया है। इस तरह छोटे फैक्टरी मालिकों की भारी संख्या को फैक्टरी एक्ट के दायरे से बाहर कर दिया गया है। हर कोई जानता है कि मज़दूरों की बहुत बड़ी आबादी आज छोटे-छोटे कारख़ानों या वर्कशॉपों में काम करती है। उदारीकरण के दौर में पूरी दुनिया में पूँजीपतियों ने बड़े कारख़ानों को बन्द कर उत्पादन की कार्रवाई को ढेरों छोटी-छोटी इकाइयों में बाँट दिया है। भारत में कारख़ानों की बहुसंख्या छोटी इकाइयों की है, हालाँकि इनमें से ज़्यादातर इकाइयाँ उत्पादन की एक लम्बी शृंखला में बड़े कारख़ानों से जुड़ी हुई हैं। इन लाखों कारख़ानों में काम करने वाले करोड़ों मज़दूरों पर कौन-सा क़ानून लागू होगा, यह किसी को पता नहीं है। दूसरी तरफ़, इस संशोधन ने एक मालिक के लिए अलग-अलग खाते दिखाकर फैक्टरी एक्ट से बचना बहुत आसान कर दिया है। दिल्ली समेत सभी शहरों के औद्योगिक इलाकों में ऐसे कारख़ाने आम बात हैं, जहाँ एक ही बिल्डिंग के भीतर एक ही मालिक की तीन-चार कम्पनियाँ चलती हैं।

दूसरी तरफ़ मज़दूरों के लिए यूनियन बनाना और भी मुश्किल कर दिया गया है। मूल क़ानून के अनुसार किसी भी कारख़ाने या कम्पनी में 7 मज़दूर मिलकर अपनी यूनियन बना सकते थे। फिर इसे बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया गया। यानी किसी फैक्टरी में काम करने वाले मज़दूरों का कोई ग्रुप अगर कुल मज़दूरों में से 15 प्रतिशत को अपने साथ ले ले तो वह यूनियन पंजीकृत करवा सकता है। मगर अब इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है। मतलब साफ़ है कि अगर फैक्टरी मालिक ने अपनी फैक्टरी में दो-तीन दलाल यूनियनें पाल रखी हैं तो एक नयी यूनियन बनाना बहुत कठिन होगा और फैक्टरी जितनी बड़ी होगी, यूनियन बनाना उतना ही मुश्किल होगा। ठेका क़ानून भी अब 20 या इससे ज़्यादा मज़दूरों वाली फैक्टरी पर लागू होने की जगह 50 या इससे ज़्यादा मज़दूरों वाली फैक्टरी पर लागू होगा। यानी जिस फैक्टरी में 50 से कम मज़दूर काम करते होंगे, उस पर ठेका क़ानून लागू ही नहीं होगा। इसका अंजाम क्या होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है।

एक और ख़तरनाक क़दम के तहत इण्डस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 में संशोधन करके अब कम्पनियों को 300 या इससे कम मज़दूरों को निकाल बाहर करने के लिए सरकार से अनुमति लेने से छूट दे दी गयी है, पहले यह संख्या 100 थी। यानी अब किसी पूँजीपति को अपनी ऐसी फैक्टरी जिसमें 300 से कम मज़दूर काम करते हैं, को बन्द करने के लिए सरकार से पूछने की ज़रूरत नहीं है। हालाँकि पूँजीपति पहले भी इस क़ानून को ठेंगे पर रखते थे और मनमाने ढंग से कम्पनियाँ बन्द करके कर्मचारियों को सड़कों पर निकाल फेंकते थे। लेकिन अब वे यह काम बेरोकटोक क़ानूनी तरीके से कर सकते हैं। फैक्टरी से जुड़े किसी विवाद को श्रम अदालत में ले जाने के लिए पहले कोई समय-सीमा नहीं थी, अब इसके लिए भी तीन साल की सीमा तय कर दी गयी है।

और बेशर्मी की हद यह है कि ये सब “रोज़गार” पैदा करने तथा कामगारों की काम के दौरान दशा सुधारने तथा सुरक्षा बढ़ाने के नाम पर किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे ज़्यादा निवेश होगा तथा ज़्यादा नौकरियाँ पैदा होंगी। असल में कहानी रोज़गार बढ़ाने की नहीं, बल्कि पूँजीपतियों को मज़दूरों की लूट करने के लिए और ज़्यादा छूट देने की है। ये तो अभी शुरुआत है, श्रम क़ानूनों को ज़्यादा से ज़्यादा बेअसर बनाने की कवायद जारी रहने वाली है और पूरे भारत में यही होने वाला है। राजस्थान सरकार द्वारा किये गये संशोधनों के पीछे-पीछे दूसरे राज्य (चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो) भी यही करेंगे, क्योंकि उनके पास भी “रोज़गार” पैदा करने जैसे बहाने मौजूद हैं तथा इससे वे सहमत भी हैं। यदि उन्हें अपने यहाँ पूँजी को रोके रखना है तो अन्य राज्य राजस्थान से भी आगे बढ़कर ज़्यादा मज़दूर-विरोधी संशोधन करेंगे। इस सबके बीच पूँजी का कुल्हाड़ा मज़दूर वर्ग के ऊपर और ज़ोर से चलेगा। बहरहाल पूँजीपति ख़ुश हैं और उनका भोंपू मीडिया इसके पक्ष में माहौल बनाने में जुट गया है। मारुति सुजुकी इण्डिया लिमिटेड के चेयरमैन आर.सी. भार्गव ने उनके मन की बात को साफ़ शब्दों में कह दिया है कि श्रम क़ानूनों को ख़त्म करने की दिशा में अभी तो हरकत शुरू हुई है। वे साफ-साफ यह माँग पेश कर रहे हैं कि उन्हें जब चाहे फैक्टरी बन्द करने का अधिकार होना चाहिए। मतलब कि उन्हें फैक्टरी से 300 मज़दूर निकालने या फैक्टरी बन्द करने वाला संशोधन अभी भी कम लग रहा है। इसके लिए ऐसा क़ानून होना चाहिए कि फैक्टरी से मज़दूरों को निकालने या फैक्टरी बन्द करने में कोई भी सरकारी या क़ानूनी दख़ल बिल्कुल न हो।

मोदी सरकार के 100 दिन के एजेण्डे में श्रम क़ानूनों में बदलाव को पहली प्राथमिकताओं में से एक बताया जा रहा है। पूँजीपतियों की तमाम संस्थाएँ और भाड़े के बुर्जुआ अर्थशास्त्री उछल-उछलकर सरकार के इन प्रस्तावित क़दमों का स्वागत कर रहे हैं और कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था में जोश भरने और रोज़गार पैदा करने का यही रास्ता है। कहा जा रहा है कि आज़ादी के तुरन्त बाद बनाये गये श्रम क़ानून विकास के रास्ते में बाधा हैं, इसलिए इन्हें कचरे की पेटी में फेंक देना चाहिए और श्रम बाज़ारों को “मुक्त” कर देना चाहिए। विश्व बैंक ने भी 2014 की एक रिपोर्ट में कह दिया है कि भारत में दुनिया के सबसे कठोर श्रम क़ानून हैं जिनके कारण यहाँ पर उद्योग-व्यापार की तरक्की नहीं हो पा रही है। पूँजीपतियों के नेता बड़ी उम्मीद से कह रहे हैं कि निजी उद्यम को बढ़ावा देने और सरकार का हस्तक्षेप कम से कम करने के पक्षधर नरेन्द्र मोदी इंग्लैण्ड की प्रधानमन्त्री मार्गरेट थैचर या पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की तर्ज पर भारत में उदारीकरण को आगे बढ़ायेंगे। इनका कहना है कि सबसे ज़रूरी उन क़ानूनों में बदलाव लाना है जिनके कारण मज़दूरों की छुट्टी करना कठिन होता है।

कहा जा रहा है कि बाज़ार में होने वाले उतार-चढ़ाव के हिसाब से पूँजीपति माल का उत्पादन घटाते- बढ़ाते हैं। इसलिए उन्हें इसी हिसाब से मज़दूरों की संख्या को भी मनमर्ज़ी से घटाने-बढ़ाने का अधिकार होना चाहिए। जैसे मज़दूर ज़िन्दा इंसान न होकर कोई कच्चा माल हो जिसे ज़रूरत के हिसाब से कम-ज़्यादा कर लिया जाये! काम से बाहर कर दिये जाने पर मज़दूर और उसका परिवार कैसे जियेगा, इसकी पूँजीपतियों और उनके भाड़े के पैरोकारों को कोई परवाह नहीं होती। उन्हें सिर्फ अपने मुनाफ़े से मतलब होता है।

पूँजीपतियों की लगातार कम होती मुनाफ़े की दर और ऊपर से आर्थिक संकट तथा मज़दूर वर्ग के बढ़ते बग़ावती तेवर से निपटने के लिए पूँजीपतियों के पास आखि़री हथियार फासीवाद होता है। भारत के पूँजीपति वर्ग के भी अपने इस हथियार को आज़माने के दिन आ गये हैं। फासीवादी सत्ता में आते तो मोटे तौर पर मध्यवर्ग (तथा कुछ हद तक मज़दूर वर्ग भी) के वोट के बूते पर हैं, लेकिन सत्ता में आते ही वह अपने मालिक बड़े पूँजीपतियों की सेवा में जुट जाते हैं। राजस्थान सरकार के ताज़ा संशोधन इसी का हिस्सा हैं। मगर फासीवाद के सत्ता में आने के बाद बात श्रम क़ानूनों को कमज़ोर करने तक ही नहीं रुकेगी, क्योंकि फासीवाद बड़ी पूँजी के रास्ते से हर तरह की रुकावट दूर करने पर आमादा होता है और यह सब वह “राष्ट्रीय हितों” के नाम पर करता है। फासीवादी राजनीति पूँजीपतियों के लिए काम करने, उनका मुनाफ़ा बढ़ाने को देश को “महान” बनाने के तौर पर पेश करती है।

आने वाले दिन मज़दूरों के लिए और भी कठिनाइयाँ लेकर आने वाले हैं। मगर मज़दूर वर्ग इतिहास में हमेशा कठिनाइयों से लड़ते हुए ही मज़बूत हुआ है। आज देशभर में मज़दूर जाग रहे हैं और हकों के लिए आवाज़ उठा रहे हैं। ज़रूरत है, एक क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियन आन्दोलन खड़ा करने और बिखरे हुए संघर्षों को एकजुट करने की।