एक दीप बुझ गया…

October 26, 2014

[Sushil Roy, veteran political revolutionary and central committee member of the CPI(Maoist), passed away on 20th June, 2014. We received the following article from Vijay Kumar Arya, another central committee member of the CPI(Maoist) currently imprisoned in Visakhapatnam jail, who wrote it in memory of his departed comrade, Sushil Roy. We are thankful to the Hindi magazine Samayantar for the typeset version of the article which also appeared in their online edition. -Ed]

लेखक : विजय कुमार आर्य

तारीख 20 जून 2014। विशाखापट्टनम सेंट्रल जेल के राजनीतिक बंदियों वाले चित्रावली खंड में जेल के जीवन की एकरस और उबाऊ जिंदगी को गुलजार बनाने की कोशिशों के बीच एक रूटीनी सुबह। रोज की तरह अखबार आते हैं और साथीगण हेडलाइनें देखने में व्यस्त हैं। नजर पड़ती है तेलुगू अखबार के एक कोने पर। प्रख्यात माओवादी नेता सुशील राय का दिल्ली के एम्स में निधन। यह खबर मशहूर क्रांतिकारी कवि और लेखक वरवरा राव के हवाले से है। तेलुगूभाषी साथी पूरे ब्लॉक में इस खबर के बारे में बताता है और एक मातमी सन्नाटा पसर जाता है। मानो पूरे माहौल को काठ मार गया। हमको इतना तो पता था कि लंबी और निरंतर जेल यातना की वजह से अशक्त शरीर लिए वह तरह-तरह की बीमारियों एवं परेशानियों से जूझ रहे थे। लेकिन इस तरह कुछ अचानक सा…। उनका चला जाना भारत के कम्युनिस्ट क्रांतिकारी आंदोलन की एक समूची धारा के आदिस्रोत का सूख जाना है।

वरुण दा, वेरा दा, सुर्थु दा, अशोक दा और अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलनों और संगठनों के बीच कामरेड सोम के नाम से जाने-जाने वाले कामरेड सुशील राय एक ऐसी राजनीतिक शख्सियत का नाम था, जिसने हाल तक माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र (एमसीसी) के नाम से जानी जाने वाली पार्टी के सूत्रपात में अहम भूमिका निभाई थी। सीपीआई (एम) की 1964 की सातवीं कांग्रेस की संशोधनवादी लाइन के विरोध में खड़ी चिंता पत्रिका के आधार पर गठित ‘चिंता ग्रुप’ और बाद में ‘दक्षिण देश’ ग्रुप के वह एक अन्यतम योद्धा रहे थे। निधन के समय उनकी उम्र करीब 70 वर्ष थी। वह अविवाहित थे।

कामरेड सुशील राय ने बांग्ला भाषा में एम.ए. तक की शिक्षा प्राप्त की थी। उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत एक ट्रेड यूनियन नेता के रूप में हुई। वह उषा मार्टिन कंपनी ( कोलकाता) में एक कर्मचारी के रूप में कार्यरत थे। सन् 1964-65 में माकपा के भीतर चल रहे विचारधारात्मक संघर्ष के समय से ही वह क्रांतिकारी वामपंथी राजनीति में सक्रिय हुए। उन दिनों ‘चिंता’ और ‘दक्षिण देश’ पत्रिकाओं के प्रकाशन में कामरेड अमूल्य सेन और कन्हाई चटर्जी के वह महत्त्वपूर्ण सहयोगी थे। बाद में 20 अक्टूबर 1969 को जब माओवादी कम्युनिस्ट केंद्र (एमसीसी) का गठन हुआ, तब वह उसमें शामिल हुए और उसकी केंद्रीय कमेटी के सदस्य बने।

सन् 1981 में जब अमूल्य सेन का निधन हो गया और उनके बाद के. सी. का निधन हो गया तब अटकलें लगायी जाने लगीं कि अब एमसीसी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, क्योंकि उस समूह में अब वैसा नेता नहीं रहा है। 18 जुलाई 1982 को सुशील राय एमसीसी के सचिव बनाए गए। उस समय से लेकर एमसीसी के दूसरे सम्मेलन (1996) तक वह उसके सचिव रहे। लेकिन अपनी अस्वस्थता के कारण और खासकर एक आंख की रोशनी पूरी तरह समाप्त हो जाने के कारण सम्मेलन के बाद उन्होंने सचिव पद से इस्तीफा दे दिया, पर वह केंद्रीय कमेटी में बने रहे। के.सी. की राजनीतिक लाइन को वास्तविक रूप देने में सुशील राय की महत्पूर्ण भूमिका रही। उनके नेतृत्व में एमसीसी का विस्तार हुआ।

पार्टी के भीतर दो लाइनों के संघर्ष में कामरेड राय ने हमेशा सही लाइन का पक्षपोषण किया और उसे प्रमोट किया। उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के बड़े ही साहस के साथ मध्य बिहार में पनप रहे गैर सर्वहारा रूझानों को चिन्हित किया और उसका विरोध भी किया। खासकर संकीर्णतावाद, कठमुल्लावाद, व्यक्तिवाद, नेतृत्व पूजा, गुरुवाद एवं विशुद्ध सैन्यवाद का। सन् 1989 में मध्य बिहार के संघर्ष में उपजी समस्या पर आयोजित ऐतिहासिक आम सभा की बैठक में कामरेड राय ने बड़ी ही दृढ़ता के साथ कतारों से कहा- ‘नेतृत्व को सिर पर चढ़ाकर नहीं रखिए कामरेड! कंधे पर रखिए, ताकि उसकी गतिविधियों पर आप निगरानी रख सकें। नेतृत्व को सिर पर उठाए रखना कम्युनिस्ट उसूल के खिलाफ है। गुरुवाद क्रांतिकारी संघर्ष के लिए एक खतरनाक प्रवृत्ति है। उस वक्त उन्होंने यह भी चिन्हित किया था कि मध्य बिहार के कुछ इलाकों में वर्ग-दिशा और जन-दिशा की समस्या उठ खड़ी हुई है। हम जनता से कटते जा रहे हैं।

एमसीसी के भीतर बादल-भरत गुट के विजातीय प्रवृत्तियों और रुझानों के खिलाफ चले तीव्र संघर्ष में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। खासकर भरत के चरम व्यक्तिवाद और एकमात्र निधुंका कम्युनिस्ट क्रांतिकारी होने व समझने की सनक के खिलाफ।

कामरेड सुशील राय विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन और भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास के अच्छे जानकार थे। वह कहते थे कि कम्युनिस्ट क्रांति के सामने संशोधनवाद प्रमुख खतरा है, इसलिए इसके बारे में सही-सही जानकारी और अवस्थिति (स्टैंड) रखना हर सच्चे कम्युनिस्ट की जिम्मेदारी है।

सुशील राय इस बात को लेकर काफी चिंतित रहते थे कि 1970 के दशक के बाद से पार्टी में मजदूर वर्ग की भागीदारी घटती जा रही है। इसके कारण पार्टी और क्रांतिकारी वर्ग संघर्ष में कई तरह के भटकाव आ सकते हैं। सिर्फ किसानों को लेकर पार्टी ढांचे का निर्माण करने से कई कमियां दृष्टिगोचर हो रही हैं। (पहले यह समझ थी कि अलग ट्रेड यूनियन बनाने से मजदूर वर्ग में विभाजन हो जाता है, इसलिए बी-बनाई ट्रेड यूनियनों में घुसकर काम करना चाहिए)।

उनकी सोच में राजनीतिक गहराई के साथ-साथ दूरदृष्टि भी होती थी और व्यवहार में व्यापकता व लोच। उन पहलों ने 21 सितंबर 2004 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई।

सीपीआई (माओवादी) के गठन के बाद कामरेड सुशील राय उसके पोलित ब्यूरो सदस्य बनाए गए थे, लेकिन ज्यादा दिनों तक वह बाहर नहीं रह सके। वर्ष 2005 में उन्हें पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के एक रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया। पश्चिम बंगाल की सीपीएम सरकार ने आनन-फानन में न्याय की नौटंकी कर उन्हें और उनके दो साथियों को आजीवन कारावास की सजा दिला दी। बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दे दी। इसके बावजूद झारखंड पुलिस ने जेल के दरवाजे से ही उन्हें गिरफ्तार कर पश्चिमी सिंहभूम जिले के कई फर्जी मुकदमों में फंसाकर चाईबासा जेल में बंद कर दिया। उन पर लगातार फर्जी मुकदमे लादे गए और जब-जब उन्हें जमानत मिली तब-तब झारखंड पुलिस एक न एक नया केस लगाकर उन्हें पकड़ती रही। इस तरह लगभग सात सालों तक वह विभिन्न जेलों में कैद रहे। बढ़ती उम्र और अस्वस्थता के कारण उनकी सेहत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई। सरकार ने जान-बूझकर उनका इलाज नहीं करवाया। बीमारी की हालत में ही एक दिन टॉयलैट में पैर फिसल जाने के कारण वह गिर गए, जिसके कारण कूल्हे की हड्डी टूट गई। इसके चलते वह वर्षों बिस्तर पर पड़े रहे। चलना-फिरना तो दूभर था ही, यहां तक कि पेशाब-पैखाना भी बिस्तर पर ही करना पड़ता। इस दौरान उन्हें रिम्स हॉस्टिपल रांची में रखा गया, पर वहां उन्हें देखने-सुनने वाला कोई नहीं था। न डॉक्टर और न ही नर्स। किसी भी सहयोगी को मदद करने की इजाजत पुलिस ने नहीं दी। अत: गंदगी और चिकित्सीय लापरवाही के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया और उन्हें मरणासन्न हालत में पहुंचने में देर नहीं लगी। इस हालत में उनके भाई और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की पहल पर इलाज के लिए उन्हें एम्स (दिल्ली) ले जाया गया। इससे उनके प्राण तो तत्काल बच बए। अदालत ने बिगड़ते स्वास्थ्य के आधार उन्हें जमानत दे दी। उधर, पुलिस ने जब यह भांप लिया कि वह शीघ्र मरने वाले हैं, तो उसने कोई भी नया केस नहीं लगाया। परिणामस्वरूप वह वर्ष 2012 में जेल से बाहर आ गए।

रोज-रोज की चिकित्सीय जरूरत को देखते हुए उन्हें दिल्ली में ही रहना पड़ा और बीच-बीच में एम्स में जांच करवानी पड़ी। दरअसल, कामरेड सुशील राय अपनी नियति जानते थे। ‘कानूनी हत्या की जाएगी मेरीÓ- इस बात का जिक्र उन्होंने जेल से लिखे एक पत्र में किया था। इस पत्र में उन्होंने लिखा था- ‘जब मैं गिरफ्तार हुआ था, तो उसी वक्त आईबी वालों ने कहा था कि अब तुम्हारी लाश ही जेल से बाहर जाएगी बरुण।’ और सचमुच में वही हुआ। कामरेड वरुण दा ने अपना शरीर एम्स (दिल्ली) को दान कर दिया।

सुशील राय ने बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के नाम लिखे एक खुले पत्र में माकपा के जनविरोधी चरित्र की भर्त्सना की। साथ ही बुद्धदेव भट्टाचार्य के व्यक्तिगत घंमड को निशाना बनाते हुए कहा था- ‘अगर तुम्हें घमंड है कि तुम सुकांत (बांग्ला के मशहूर कवि) के भतीजे हो, तो यह भी जान लो कि मैं भी शहीद दिनेश का भतीजा हूं।’ स्वाधीनता संग्राम के समय बंगाल के तीन ख्यातिप्राप्त व सम्मानित शहीद – विनय, बादल और दिनेश, जो विबादि के नाम से मशहूर हैं तथा जिनके नाम पर कोलकाता में विबादि बाग नामक जगह भी है, उन्हीं शहीद दिनेश के भतीजे थे कामरेड सुशील राय।

सुशील राय हंसमुख, मिलनसार और विनोदशील व्यक्ति थे। आम कार्यकर्ता उनसे घुले-मिले रहते। बंगाल के क्रांतिकारी, गायक और संगीतप्रेमी न हों, ऐसा हो ही नहीं सकता। वह बांग्ला, हिंदी और अंग्रेजी में धाराप्रवाह गाते थे। उनकी पश्चिम बंगाल की विभिन्न क्षेत्रीय बोलियों पर अच्छी पकड़ थी। इतना ही नहीं वह पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के भी विभिन्न क्षेत्रों में बांग्ला कैसे बोली जाती है, उसे सोदाहरण बोलकर बताते।

उनका एक लोकप्रिय हिंदी गीत, जिसे वह बिहार-झारखंड में हमेशा गाया करते थे, प्रस्तुत है। यह गीत उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता, उनके क्रांतिकारी ओज तथा उत्साह एवं उनकी आशा और जिजीविषा को जाहिर करता है। वस्तुत: इस गीत की याद करना उनके प्रति श्रद्धांजलि भी है-

जल रही, जल रही
जल रही जिंदगी, जीत की मशाल है
जल रहा है आसमां, और लाल-लाल है
एक दीप बुझ गया, दूसरा जला हुआ
दूसरा से तीसरा, और भी जला हुआ…ठ्ठ
लेखक राजनीतिक बंदी हैं।