बवाना में साम्प्रदायिक ताकतों की पराजय (Defeat of communalist forces in Bawana)

November 9, 2014

 

सुनील कुमार

I

बवाना उत्तरी पश्चिमी दिल्ली का हिस्सा है। 12-13 साल पहले इसकी पहचान दिल्ली के पिछड़े इलाके में हुआ करता था। औद्योगिक इकाईयों की संख्या गिनी-चुनी थी। यमुना पुस्ता, शान्तिवन, राजघाट की झुग्गियों को तोड़कर बवाना इलाके में बसाया गया जिसके कारण तेजी से इस इलाके का औद्योगीकरण हुआ।

बवाना जे.जे. कॉलोनी की आबादी एक लाख से अधिक है और हिन्दू-मुस्लिम जनसंख्या करीब 50-50 प्रतिशत है। हिन्दूओं में ज्यादातर पिछड़ी और दलित समुदाय से है। 90 प्रतिशत आबादी यूपी और बिहार से है। 100 प्रतिशत जनता मेहनतकश वर्ग से है। ज्यादातर लोग फैक्ट्रियों में काम करते हैं तो कुछ रेहड़ी-पटरी या कॉलोनियों में छोटे धंधे करके अपने परिवार के पेट की भूख शांत करते हैं। यहां की मेहनतकश जनता में, अचेतन रूप में ही सही वर्गीय एकता बहुत मजबूत है। उनको जाति या धर्म की दीवारों के बीच नहीं बाटा जा सकता है। यही कारण है कि ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति पर चलने वाली साम्प्रदायिक शक्तियां अभी तक सफल नहीं हो पायी हैं। इस कॉलोनी के 31-32 हजार वोटर किसी भी पार्टी को जीत दिलाने में एक निर्णायक भूमिका अदा कर सकते हैं।

बवाना में जब जे.जे. कॉलोनी को बसाया गया उस समय औद्योगिक विकास और अन्य कामों के लिए लेबर (मजूदर) की मांग थी। इसलिए इन कॉलोनी वासियों को दिल्ली के मध्य से उजाड़ कर दिल्ली के ऐसे इलाके में फेंक दिया गया जहां मानव जीवन के लिए कोई भी मूलभूत सुविधा नहीं हुआ करती थी। मेहनतकश आवाम के बल पर इस क्षेत्र का विकास हुआ। औद्योगिक कारखानों की संख्या में इजाफा हुआ और जमीन की किमतों में बेतहासा वृद्धि हुई। जिससे गांव वालों के पास पैसे आ गये और अच्छे मकान, अच्छी गाड़ियों की संख्या मंे इजाफा हो गई। जे.जे. कालोनी आने से पहले बवाना और आस-पास के गांव के अधिकांश लोग किसानी जिन्दगी व्यतीत करते थे और उसी तरह के रहन-सहन में रहते थे। गांव वाले जमीन का पैसा लेकर और धंधे (विशेष कर किराये पर मकान, दुकान, गोदाम) करके मध्यमवर्गीय शहरी जिन्दगी जीने लगे। इन मध्यमवर्गीय शहरियों को जे.जे. कालोनी वाले ‘गन्दे’ लगने लगे और इन पर गन्दगी फैलाने व अन्य गैर कानूनी काम करने का आरोप लगने लगे।

जे.जे. कालोनी का वोट बैंक कांग्रेस का था लेकिन 2013 के चुनाव में आप पार्टी ने यहां पर अपना पैर जमाया। इस कॉलोनी पर साम्प्रदायिक शक्तियों की गिध दृष्टि लगी हुई है। यहां पर बकरीद के समय से लगातार धर्म के नाम पर लड़ाने का प्रयास किया जा रहा है। बकरीद के दो दिन पहले इस कॉलोनी के सामने गाय लाकर बांध दिया गया था जिसकी सूचना कॉलोनी के लोगों ने रात में ही पुलिस को दी। पुलिस ने तत्काल कदम उठाते हुए गाय को श्री कृष्ण गऊशाला में भिजवा दिया। बकरीद के समय कुछ लोग कॉलोनी में आये और कहने लगे कि गऊशाला से गाय चोरी हुई है, हम गाय खोज रहे हैं। उसके बाद से इस इलाके में साम्प्रदायिक उन्माद वाले पर्चे-पोस्टर बांटे और चिपकाये जाते रहे हैं। एक पर्चे का जिक्र करते हुए रफिक ने बताया कि उस पर लिखा था, ‘‘कटती गाय की है यह पुकार, कहां गई हिन्दू तलवार’’। इस तरह के हथकंडे अपनाने के बावजूद कॉलोनीवासियों की एकता को तोड़ नहीं पाये, जिसके कारण उनको इस बस्ती में दहशतगर्दी फैलाने का मौका नहीं मिला।

दहशतगर्द साम्प्रदायिक शक्तियों को 11 साल से जे.जे. कॉलोनी में मनाये जा रहे मुहर्रम के रूप में एक मौका दिखने लगा। वे प्रचारित करने लगे कि मुहर्रम के दिन ताजिया के समय मुस्लिम समुदाय शक्ति प्रदर्शन और महिलाओं के साथ छेड़-छाड़ करते हैं, इसलिए यह ताजिया जे.जे. कॉलोनी के अलावा और किसी इलाके में नहीं घुमाया जाये। इस बात को लेकर 26 अक्टूबर को एसीपी, डीसीपी, नरेला, बवाना थाने वा जे.जे. कॉलोनी वालों के साथ बवाना इं. एरिया के सेक्टर 3 के गोल चक्कर के पास एक मीटिंग हुई। इस मीटिंग में सहमती हो गई थी कि वह ताजिया को अपने कॉलोनी तक ही सीमित रखेंगे। सहमति होने के बावजूद 2 नवम्बर को बवाना में साम्प्रदायिक शक्तियों के संगठन भगत सिंह समिति द्वारा महापंचायत का आयोजन किया गया (जिसमें भाजपा विधायक समेत कांग्रेसी पार्षद उपस्थित थे) और समुदाय विशेष के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिया गया। भगत ंिसंह समिति के संयोजक प्रदीप माथुर कह रहे हैं कि जुलूस पर सहमति का लिखित पत्र हमें प्राप्त नहीं हुआ इसलिए महापंचायत करना पड़ा। प्रदीप माथुर गऊ राक्षा समिति से भी जुड़े हुए हैं। पुलिस ने इस तरह के महापंचायत को होने दिया। किसी भी दल या संगठन पर कानूनी कार्रवाई नहीं की गई।

II

कॉलोनीवासियों की एकता

इस कॉलोनी में सभी धर्मों व जातियों के घर मिले-जुले हैं। वह एक दूसरे के सुख-दुख, शादी, त्यौहारों में भागीदारी करते हैं। एक दूसरे के घर आते-जाते, बैठते, काम करते हैं। बच्चे एक साथ खेलते और पढ़ते हैं। बाजार में उनकी एक साथ दुकाने हैं। किसी को किसी से कोई परेशानी नहीं है, सब एक दूसरे से मिल-जुल कर रहते हैं। उनकी शिकायत है तो सरकार से, जो कि अभी तक उनके लिए पीने की पानी नहीं दे पाई। कॉलोनी में एक डिस्पेंसरी थी वह भी बंद हो गई, स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती।

जे.जे. कॉलोनी की चारों तरफ से पुलिस ने बैरकेटिंग कर रखी है। बच्चे उत्साहित हैं। जगह जगह पर ताजिया छोट-बड़े रिक्शे पर रखे गये हैं। ताजिया के पास मिट्टी का चबूतरा बना हुआ है। सोनू 15-20 लड़कों के साथ (जिनकी उम्र 10 से 25 साल है) हरा ड्रेस पहने, माथे पर साफा, हाथ में पंखरी लिये हुए चबूतरे पर जा-जा कर इमाम हुसेन के लिए आयतें पढ़ रहे हैं। बच्चे खुश हैं। लेकिन बड़े-बुर्जुग चिंतित है कि पता नहीं जुलूस निकल पायेगा कि नहीं। जगह-जगह खिचड़ी और शरबत बंट रहे हैं, जिसमें कॉलोनी के हिन्दू-मुस्लिम सभी एक होकर बांट रहे हैं। ऐसे ही एक प्याऊ पर हमें ब्रह्मदेव यादव, हाजीज मुहम्मद अरफद, राजेन्द्र तिवारी, रमेश कुमार, भोले शर्मा मिले। ये सभी लोग एक स्वर में बोले कि हम यहां 10-11 साल से प्रेम के साथ रहते आये हैं और साथ में मिल-जुलकर एक दूसरे के त्यौहार को मनाते हैं। ये कहते हैं कि हम एक ही थाली में खाते हैं हमें कोई परेशानी नहीं है।

ए ब्लॉक में एक साथ दरवाजे के बाहर गीता देवी और रूबीना खातून बैठी हुई बातें कर रही थीं। जब मैंने उनसे इस तरह के माहौल के बारे में जानना चाहा तो वह हमसे ही पूछी कि यह क्यों हो रहा है? बोली कि हमें तो मीडिया से ही पता चला है कि ताजिया निकलने से रोका जा रहा है। हमारे मुहल्ले में तो सभी शांति से रहते हैं। हमें तो परेशानी है गंदी नाली, महंगाई से, हमें पीने के लिए पानी नहीं मिलता है। कमाई से ज्यादा खर्च हैं। हम लोगों की लड़ाई बच्चों को लेकर या गंदी नाली को लेकर हो जाती है। हम धर्म और जाति के नाम पर नहीं लड़ते हैं। हम मिल कर रहते हैं, बाहर वाले कुछ नहीं कर पायेंगे। हम लड़ कर भाग जायेंगे तो इससे हम लोगों को नुकसान होगा। रूबीना बोलती है कि हमें सरकार से दिक्कत है।

प्रियंका, रेनू, सालू, सलूमा, छोटी, महजबी, गुलशन 5वीं, छठवीं की छात्रा हैं, जो एक साथ खेल रही हैं। गुलशन के घर से सभी खाना खा कर आयी हैं। बताती हैं कि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है, खेलने के लिए जगह नहीं है, स्कूल में भी गंदगी रहती है। टीचर आती है तो फोन पर लगी रहती है, कोई शिकायत करने पर डांट कर बैठा देती है और पढ़ाती नहीं है, समय से पहले चली जाती है।

रूमा देवी 10 साल से इस कॉलोनी में रहती हैं वह कहती है कि ‘‘यह फिजूल की लड़ाई है। सभी एक साथ मिल-जुल कर रह रहते हैं तो उनको हटाना, लड़ाना फालूत का काम है। सभी चाहते हैं कि अच्छे से त्यौहार मनाएं। अगर हम इनके त्यौहार को आज रोकेंगे तो कल ये हमारा त्यौहार को रोकेंगे तो लड़ाई होगी कि नहीं? जो नेता पंचायत करते हैं वह गलत कर रहे हैं।  लड़कर आज तक किसी को कुछ नहीं मिला है।’’ यहां बैठे अनवर बताते हैं कि हिन्दू, मुसलमान के बच्चे रोते हैं तो दोनों अल्लाह अल्लाह करते हैं। यहां बैठे और लोग बताते हैं कि एक डिस्पनेसरी थी वह भी बंद हो गई, अब बवाना के लोगों को और ज्यादा बीमार होने पर पूठ कला अस्पताल जाना पड़ता है। शौचालय साफ नहीं रहता है, एक बार जाने पर दो रुपये देेने पड़ते हैं।

मुझे एक कमरे में सीतामढ़ी के फरियाज और मुंगेर के रहने वाले रितेश दिखे, जो कि साड़ी कढ़ाई का काम कर रहे थे। रितेश, फरियाज एक दूसरे को भईया और बाबू कहते हैं। वो कहते हैं कि काम एक साथ करने में ही अच्छा लगता है। दंगा भड़काने पर बोलते हैं कि ‘‘हमें कुछ मालूम नहीं है कि बाहर क्या हो रहा है, हमारी ड्युटी सुबह 9 बजे से रात की 11 बजे तक होती है। इतनी लम्बी ड्युटी करने पर 300 रु. मिलता है।’’ धर्म कौन छोटा है और कौन बड़ा पूछने पर रितेश कहते हैं कि ‘‘कोई धर्म छोटा या बड़ा नहीं है। छोटा-बड़ा कहना सही बात नहीं है। धर्म जिसका हो उसके लिए ठीक है।’’ रितेश स्कूल से आकर 3 बजे से 11 बजे तक काम करते हैं और महीने का 5-6 हजार रु. कमा लेते हैं। पिता बीमार हैं, दो भाई काम करके घर का खर्च चलाते हैं। रितेश का स्कूल के दोस्त में विशाल, अनवर, अर्जुन, विकास, इमरान हैं, जो सभी मिल-जुल कर रहते हैं।

रास्ते में सीता और अफीजा बेगम मिली। सीता का अपना घर है और अफीजा किराये के घर पर पति के साथ रहती है। अफीजा बताती है कि ‘‘हम होली, दीपावली मिल-जुल कर मनाते हैं। यहां के हिन्दू और मुसलमान साथ रहते हैं।’’ एक महिला आती है और सवाल करती है कि होली, दीपावली हिन्दूओं का त्यौहार अच्छा से मनता है, मुसलमान के त्यौहार में ऐसा क्यों हो रहा है? सीता कहती है कि ‘‘इस कॉलोनी को बदनाम किया जाता है कि यहां दारू, चरस बिकता है। सरकार इसको बनाती क्यों है? सरकार इसको बनाये नहीं, इससे हिन्दू, मुसलमान दोनों के लड़के बिगड़ते हैं। बवाना और बाहर से लोग पीने के लिए यहां आते हैं। पुलिस कुछ नहीं करती है। पुलिस के पास शिकायत करने पर अच्छे लोग को मार कर भगा देती है, बुरे को बैठाती है। सरकार 13 साल पहले यहां हम लोगों को लायी थी तो कोई रोजी-रोजगार नहीं था। अब यहां रोजगार हो गया तो सरकार भगाना चाहती है।’’

III

प्रशासन की भूमिका

प्रशासन ने बकरीद से चले आ रहे माहौल में एक भी शरारती तत्व की गिरफ्तारी नहीं की और सारे खेल एक माह से चलते रहे। जे.जे. कॉलोनी को ही समझा दिया कि आप जो जुलूस 10-11 साल से जिस रास्ते पर निकालते हो वहां नहीं जाओ, अपने को सीमित रखो। ताजिये के जुलूस में शामिल होने वाले लोगों, डंडों, हथियारों की पूरी जानकारी थाने को दी जाती है जिस पर थाने का परमिशन होता है। लेकिन इस बार हथियारों की संख्या को काट कर पुसिल द्वारा दिये गये निर्देश का पालन किया गया। पुलिस की मौजूदगी में गैर कानूनी महापंचायत को होने दिया गया, किसी को रोका-टोका नहीं गया। मुहर्रम के दिन सामाजिक संगठन जब हालत को देखने, अध्ययन करने के लिए गये हुए थे तो उनके कार्यकर्ताओं (जिनमें महिलाएं भी थीं) को चुन-चुन कर पकड़ कर थाने ले जाया गया और रात के 9 बजे तक विभिन्न थानों में डिटेन करके रखा गया। ताजिये के ऊपर ड्रोन उड़ाये जा रहे थे जबकि असमाजिक तत्व खुलेआम घूम रहे थे।

जे.जे. कॉलोनी के अन्दर एक एकता दिख रही थी। बच्चे-बूढ़े, महिला-पुरुष किसी के अंदर कोई धार्मिक उन्माद नहीं था। मुहर्रम में जिस तरह माहौल खराब करने कोशिश की गई हिन्दू भी उतना ही क्रोधित थे जितना मुसलमान। मुसलमान के बच्चे जिस तरह से खुश थे उसी तरह से हिन्दू के बच्चे भी खुश थे। हिन्दू-मुसलमान दोनों का व्यापार 35-40 प्रतिशत कम हो गया था। ए और ई ब्लॉक के बाजार में सड़कों पर दिखने वाली भीड़ गायब थी। बहुत से लोग खराब माहौल को देखते हुए रिश्तेदारों या अपने गांव को चले गये थे। ताजिये के जुलूस में हिन्दू पुरुष-महिला शामिल थे। डी ब्लॉक की रहने वाली उर्मिला चौधरी ताजिये के जुलूस में तलवार और लाठियां भाज रही थी। वह इस त्यौहार को अपने त्यौहार जैसा मना रही थी। उसी जुलूस में शामिल हसिना को देखकर ऐसा लगता था कि वह हिन्दू हैं उनकी मांग पर हरे रंग की सिन्दुर और माथे पर बिन्दया उनके मुस्लिम धर्म से अलग होने का पहचान दिला रही थी। जे.जे. कॉलोनी वालों ने अपनी एकता के बल पर दंगाईयों के मुंह पर एक तमाचा जड़ा और अपने को सभ्य कहलाने वाले सामाज को जता दिया कि बस्ती में रहने वाले मेहनतकश कौम गंदी नहीं होती है। गंदे हैं सफेद पोस और गंदी है सरकार जो इस तरह की शक्तियों को बढ़ावा देती है। सरकार सामंती समाज से चले आ रहे खाप पंचायतों को प्रतिबंधित नहीं कर रही है और ‘फूट डालो, राज करो की नीति पर लोगों को बांटने का काम कर रही है। इसी फूट का लाभ उठा कर भारत का शासक वर्ग आम जनता का शोषण-दमन करती रही है। सभी सामाजिक संगठनों का दायित्व है कि वे हाल में हुए त्रिलोकपुरी व बवाना जैसी घटनाओं को रोकने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पर्चे, पोस्टरों के द्वारा उनकी एकता को बनाये रखें ताकि वे जीवन के मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर सकें।