Dec 5th protests against labour law changes

December 3, 2014

5 दिसंबर 2014 की श्रमिक वर्गीय कारवाई को एक जन आंदोलन बनाओ।
श्रमिक जनता के अधिकारों की गारंटी के बिना लोकतंत्र एक दिखावा है।
देश की जनता के कानूनी अधिकारों को छीनने वाले विधेयकों का एकजुट विरोध करो।

साथियों!

देश के 31 प्रतिशत मतदाताओं का वोट पाकर बनने वाली मौजूदा सरकार का गठन होते ही पूरी भारतीय राजनीति का लोकतांत्रिक ढांचा बहुत तेजी से बदला जा रहा है। सत्ता का संतुलन पूरी तरह से श्रमिक विरोधी और जन विरोधी शक्तियों के पक्ष में झुक गया है। देश के कानूनी ढांचे मे जो भी बातें पंूजी, कारपोरेट घरानों और बाजार की निरंकुशता की राह में रुकावट बन रहा था, उन्हें एक-एक करके हटाया जा रहा है, या फिर बदला जा रहा है। यह स्थिति तब है, जबकि बहुसंख्य मतदाताओं ने इस सरकार के खिलाफ मत दिया है। लेकिन देश की बहुसंख्य आबादी की इच्छाओं-आकांक्षाओं से बेपरवाह यह सरकार किसी भी कीमत पर देश दुनिया के निवेशकों, काले धन के मालिकों के हित में भारतीय लोकतंत्र का आधा अधूरा ढांचा नष्ट कर देने पर आमादा हंै। श्रम कानूनों में किया जाने वाला बदलाव उसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है। यदि समय रहते इस प्रक्रिया पर लगाम नही लगाई जाती तो पूरे देश में तानाशाही और आम जनता की तबाही के एक नए युग की शुरुवात होगी। यह वक्त है देश को बचाने का, लोकतंत्र को बचाने का। इसलिए 5 दिसंबर 2014 को हो रही विरोध की इस राष्ट्रीय कारवाई में पूरी ताकत से शिरकत करते हुए इसे राष्ट्रीय जन आंदोलन की दिशा में आगे बढ़ाने का संकल्प करना है।

श्रम कानूनों में श्रमिक जनता के खिलाफ बदलाव, दवा मूल्य नियंत्रण नीति में मरीजों के खिलाफ बदलाव, एफडीआई नीति में पूरे देश के खिलाफ बदलाव, राष्ट्रीयकरण कानून में सामाजिक मालिकाने के खिलाफ निजी मालिकाने के लिए बदलाव, दोहरे कराधान से बचने के नाम पर पूंजीशाहों को भारी छूट, सामाजिक सांस्कृतिक नीति में बदलाव, विदेश नीति में अमेरिकी कब्जेदारों की ओर झुकाव, सब्सिडी नीति में बड़े पूंजीपतियों के पक्ष में बदलाव आदि मिलकर एक पूरी खुराक है, पूरा पैकेज है जो इस सरकार को अपने देश में लागू करना है। और जिसकी डील भगवा पार्टी ने चुनाव के काफी पहले से की थी। इसी डील के एवज में पूंजीपतियों ने इस पार्टी पर बेहिसाब पैसा लगाया और आम लोगों को अच्छे दिन का ख्वाब दिखाया। इतना करने के बावजूद ये देश की बहुसंख्या को भ्रमित नही कर पाए, लेकिन सरकार अवश्य बना लिया। यदि सरकार इस डील को लागू करने में कामयाब हो जाती है, तो हमारा देश काले धन वालों के हितों की रखवाली करने वाला, काले धन वालों का गैर लोकतांत्रिक देश बन जाएगा। इसलिए यह लड़ाई देश की श्रमिक जनता और देशी-विदेशी काले धन वालों के बीच है। देश की आम जनता और दुनिया के वित्तीय धन्नासेठों के बीच है। न्याय और अन्याय के बीच है। वर्तमान सरकार ने कारपोरेट घरानों और विदेशी धन्नासेठों का पक्ष चुन लिया है, अब हमें अपना पक्ष तय करना है।

आज देश में करीब 50 करोड़ श्रमिक आबादी है जो खेतों-खलिहानों से लेकर दुकानों, वर्कशापों, स्कूलों, अस्पतालों, कारखानों, कार्यालयों, वित्तीय संस्थानों, होटलों, परिवहन, खदानों, कल्याणकारी योजनाओं आदि समाज के सभी हिस्सों में कार्यरत है। उनके साथ ही दस करोड़ से अधिक की युवा बेरोजगारों की आबादी जो काम पाने की उम्मीद में पूरे देश में भागती फिरती है, यही आबादी सामाजिक जीवन की हर आवश्यकता का उत्पादन करती है। जिसके बिना समाज एक दिन भी नही चल सकता है। इसलिए मुख्य बात यह है, कि जिसकी सामाजिक भूमिका इतनी जरूरी है, खुद उसकी स्थिति समाज में क्या है और वे कामचोर लुटेरे लोग जिनका सामाजिक उत्पादन में कोई योगदान नही है, उनकी हैसियत क्या है? हमारा लोकतांत्रिक राज्य किसके हितों में मुख्यतः काम करता है? वास्तविक विकास और वास्तविक लोकतंत्र की यह शर्त है कि यह समाज के वास्तविक लोगों के हितों को प्राथमिकता देना शुरू करे। लेकिन आज कल तो उल्टी गंगा बहाई जा रही है। ऊपर से उल्टा नारा दिया जा रहा है- नमामि गंगे! श्रमेव जयते!।

इस समय हमारी समस्या यह है कि हमारे देश का ट्रेड यूनियन आंदोलन कभी भी देश की पूरी श्रमिक जनता का आंदोलन नही बन सका। यह मुख्यतः संगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सुख सुविधाओं तक सीमित रहा। इसलिए जो भी श्रम कानून बने, उसका फायदा सिर्फ 10 प्रतिशत लोगों को मिला। बाकी 90 प्रतिशत के हिस्से में सिर्फ राहत योजनाओं का दान आया। लाभ पाने वालों में से भी, जो सरकारी क्षेत्र में कार्यरत थे उन्हें बेहतर सुविधाएं मिलीं, और जो निजी क्षेत्र में थे वे कानूनी जटिलता के कारण इन लाभों से वंचित रहे। इस तरह श्रमिक जनता के भीतर ही कई स्तर बन गए, जिसमें सबसे ऊपरी स्तर को कुछ लाभ देकर पूरी श्रमिक आबादी के अधिकारों के लिए लड़ने का काम बहुत पीछे चला गया। यह खाईं इतनी चैड़ी हो गई कि आज श्रमिक आबादी का सुविधा प्राप्त हिस्सा खुद को श्रमिक कहलाने में संकोच करता है। इसी का फायदा उठाकर मौजूदा सरकार ने पूरे श्रमिक वर्ग के बुनियादी अधिकारों पर हमला बोला है। इसके जवाब में हम तभी खड़े हो सकते हैं, जब हम उन सवालों को पहले उठाएं जो सर्वाधिक वंचित श्रमिक आबादी के सुख-दुख से जुड़े सवाल हैं। इसी से श्रमिक जनता की एकता बनेगी। और वह पुनः एक राजनैतिक शक्ति बनेगी। इस समय पूरी श्रमिक आबादी के साथ साथ पूरे समाज का भविष्य दांव पर लगा है।

वास्तव में आज पूंजीवादी तंत्र का भविष्य भी दांव पर लगा है। उसके विकास का हर कदम नई मंदी के रूप में लौट कर उसी पर चोट कर रहा है। जैसे जैसे दुनिया की धन दौलत मुट्ठी भर लोगों के हाथों में सिमटती जा रही है, वैसे-वैसे मंदी की मार भी बढ़ रही है। बाजार यदि आम आदमी के साथ कोई रियायत नही करता तो पूंजीपतियों के साथ भी नही करता। यदि उसका माल बिका नही, तो वह भी लुटा- पिटा दिवालिया होगा। बाजार की मार से बचने का एक ही रास्ता है। उनके पास श्रमिक को पूरी तरह अधिकार विहीन करके श्रम शक्ति को इतना सस्ता बना दो कि यदि कम माल भी बिके तो भी मुनाफा हो जाए। बाकी कमी सट्टेबाजी, टैक्स चोरी और सरकारी खजाने से अनुदान लेकर पूरी हो जाएगी। इसीलिए यह सरकार ’पाॅलिसी पैरलिसिस’ और ’इंस्पेक्टर राज’ खत्म करने के नाम पर मजदूर-श्रमिक जनता पर लगातार हमले का एक पूरा पैकेज लेकर आई है, जो इसे निश्चित तौर पर एक नई और भयावह मंदी के गड्ढ़े की ओर ले जाएगी। यह सब जानते हुए भी अपनी राह बदल नही सकते, पूंजी की सत्ता की प्रकृति ही यही है-विनाशकारी, आत्मघाती, मनुष्य विरोधी-तानाशाही।

हमारे देश में सरकारों ने 1990 से इसी विनाशकारी नीति पर चलना शुरू किया। लेकिन मौजूदा सरकार की तरह नही बल्कि एक मानवीय चेहरे के साथ। पिछली सरकारों ने परोक्ष तरीकों से श्रम कानूनों और राष्ट्रीय कानूनों को निष्प्रभावी बनाना शुरू किया। फिर 2005 में सेज कानून बनाकर ऐसे औद्योगिक क्षेत्रों के गठन का काम शुरू किया, जहां पर श्रम कानून लागू नही होते थे। और न ही देश की संप्रभुता के कोई कानून। इस समय देश में 200 से ज्यादा पूंजी के ’मुक्त क्षेत्र’ हैं। इसके साथ ही नई तकनीक से जुड़ी औद्योगिक गतिविधियों से जुड़े क्षेत्रों-आईटी, पर्यटन, निर्यात, उत्पादन आदि में ट्रेड यूनियनों के गठन पर रोक लगाकर श्रम शक्ति की कीमत को पैकेज के रूप में देना शुरू किया। मजदूरी वेतन की जगह पैकेज का अर्थ है-कोई श्रम कानून नही। अधिक शिक्षित वर्ग के लोग ’पैकेज’ पाकर यह समझे कि वे श्रमिकों से ऊपर उठ गए जबकि हुआ उल्टा।

इसी दौरान गरीबों के कल्याण के नाम पर एक और प्रयोग हुआ-मनेरेगा के नाम से। इसने तो पूंजी और श्रम-मजदूरी के रिश्तों की पूरी परिभाषा को ही उलट दिया। उसने मजदूरी वेतन को खैरात पाने में तब्दील कर दिया। ग्रामीण क्षेत्रों के पूरे ढ़ांचागत विकास का काम इसी खैराती योजना (मनरेगा) के तहत करवा लिया गया। कोई श्रम कानून आड़े नही आया। इसी दौरान ठेका मजदूरी, संविदा मजदूरी, स्कीम वर्कर आदि का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि श्रम कानूनों का औचित्य ही व्यवहार में खत्म हो गया।

इसी समय खेती-किसानी पर भी पूंजी की मार बढ़ती गई। पूरी सहकारी परियोजनाएं निष्प्रभावी बना दी गईं। और गरीब, किसानों की पूरी मेहनत निचोड़कर फ्यूचर ट्रेडिंग और कमोडिटी एक्सचेंज के जरिए सट्टेबाजों की तिजोरी में जाने लगी। उजड़ते किसानों का शहरों की ओर पलायन एक आम परिघटना बन गई। इससे श्रम शक्ति के मोल में और गिरावट आई। इसी प्रक्रिया में खेती को कारपोरेट फार्मिंग में तब्दील करने के लिए सीलिंग कानूनों में बदलाव का सिलसिला शुरू हुआ। चैतरफा श्रमिकों, गरीब किसानों के अधिकारों पर हमला।

नई सरकार इसी पृष्ठभूमि में काम कर रही है। नीतिगत स्तर पर यह सरकार पिछली कांग्रेस सरकार के सपनों को ही साकार कर रही है। पिछली सरकार की इसी तरह की धर्म निरपेक्षता ने आज की सांप्रदायिकता की राह आसान कर दी। श्रमिकों के सभी अधिकार, व्यवहार में निर्जीव बना दिए गए थे। अब उन्हें कानून की किताबों से ही मिटाया जा रहा है ताकि भविष्य में पूंजीपति मालिकों और गुलाम श्रमिकों के बीच कोई विवाद ही न पैदा हो। आज के देशी विदेशी बैंकरों- निवेशकों, काले धन वालों की यही मांग थी कि वे अब मुनाफे की राह में कोई कानूनी पचड़ा नही चाहते। क्योंकि खुद उनकी स्थिति इतनी कमजोर है कि वे अब दो झटका भी नही झेल सकते। उन्हें अपनी पूंजी और मुनाफे की सुरक्षा के लिए छप्पन इंच सीने वाला योद्धा कमांडो चाहिए। जो मजदूरी, स्थाई काम और मानवीय श्रमिक अधिकार मांगने वालों को देशद्रोही घोषित कर सके।

हमारा पूरा देश पूंजीशाहों उनके दलालों और लुटेरों के लिए एक आदर्श स्वर्ग बन जाएगा और मेहनतकश आम गरीब के लिए एक जेलखाना बनेगा। वैसे सभी कैदियों के कल्याण के लिए तिहाड़ सेन्ट्रल जेल में सभी कैदियों से जेल में ही पूंजीपतियों का कारखाना खोलकर 24 घंटे मजदूरी कराकर उत्पादन कार्य लेने का एक कानून संसद में पारित किया जा चुका है। ध्यान रहे कि वहां न्यूनतम मजदूरी 90 रुपए तय की गई है।

यह बदलाव भारत मेें कितने शान्तिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से हो रहा है इसकी ठोस गवाही के लिए 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर नोबल शांति पुरस्कार विजेता, विश्व शांति के प्रमुख रणनीतिकार माननीय ओबामा जी को आमंत्रित किया गया है।

इन कानूनी बदलावों के बाद हमारा पूरा देश ही चीन की तरह एक सेज (स्पेशल इकोनाॅमिक जोन) बना दिया जाएगा और सभी श्रमिकों की कानूनी हैसियत मनरेगा श्रमिकों जैसी हो जाएगी, चाहे उनका पैकेज कितना भी बड़ा क्यों न हो। फिर न काले धन की समस्या रहेगी न भ्रष्टाचार की। क्योंकि पूरा देश ही उन्ही का होगा। नए युग का नया लोकतंत्र। चूंकि इस देश की जनता भी पुराने लोकतंत्र के माडल से आजिज थी और उसे बदलना चाहती थी। उसकी इसी बदलाव की आकांक्षा को झूठे वायदों के बल पर ठग लिया गया। लेकिन इसका मुख्य कारण यह है कि देश की श्रमिक जनता बदलाव की इस आकांक्षा को मूर्त रूप देने में पिछड़ गई। वह टुकड़े को बचाने की छोटी-छोटी लड़ाइयों में उलझकर पूरे को गंवाने की मंजिल पर पहुंच गई।

जब सवाल एक राजनीतिक विकल्प देने का हो तो हमारा एजेंडा और कार्यनीति बदल जाती है। हमें अपने पूरे वर्ग के हितों के बारे में और पूरे देश के हितों के बारे में सोचना होता है। पूंजी की सत्ता के मुकाबले में श्रमिकों की राजनीति को सामने लाना होगा। अब देश में लोकतंत्र का संचालन पूंजीपति वर्ग के वश की बात नही रही। अब वास्तविक लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर चलाने के लिए हमें आगे बढ़कर अपना राजनैतिक दावा पेश करना होगा। इसलिए श्रम कानून में होने वाले बदलाव ही नहीं, बदलाव के पूरे पैकेज के खिलाफ बोलना होगा। अब हमें श्रम कानून ही नही चाहिए बल्कि एक ऐसा कानून चाहिए जो देश की समस्त श्रमिक जनता के लिए हो। और उसका उल्लंघन दंडनीय हो। हमें अब ऐसे कानून चाहिए जो देश की बहुसंख्य जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति का जरिया बने। उसे अपनी समस्त मानवीय गुणों के विकास का पूरा अवसर दिलाने में सहयोग करे। हमें बदलाव का अपना एजेंडा प्रस्तुत करना है, ताकि उसके इर्द गिर्द राजनीतिक गोलबंदी शुरू हो सके और 5 दिसंबर का हमारा संघर्ष एक बड़े जन आंदोलन का प्रस्थान बिंदु बन सके।

हमारे शुरुवाती मुद्दे कुछ इस तरह हैं-

एक एकीकृत श्रम कानून जो देश की पूरी श्रमिक जनता और नियोक्ता पर लागू हों एवं समस्त अफसरशाही, नियोक्ता और सरकार तीनों के लिए बाध्यकारी हों। इस कानून में सम्मान जनक जीवन के लिए आवश्यक वेतन-पारिश्रमिक, मानवोचित काम के घंटे और काम की सघनता, स्वस्थ परिवेश, काम का स्थायित्व, उचित अवकाश, न्याय संगत सेवानिवृत्ति लाभ, समान काम का समान वेतन, श्रमिक जनता की गरिमा और आजादी आदि स्पष्ट तौर पर परिभाषित हो। और हर क्षेत्र, हर दफ्तर में श्रमिकोें की निर्वाचित कमेटियों द्वारा ही इस कानून को लागू किया जाए।

काम करने योग्य सभी युवक और युवतियों को काम की गारंटी, काम न दे पाने की स्थिति में न्याय संगत क्षतिपूर्ति सरकार की ओर से दिया जाए।

खदानों, खेतों, खलिहानों, कारखानों से लेकर घर और बाजार तक काम करने वाली सभी श्रमिक महिलाओं को कम से कम दो बार एक-एक वर्ष के लिए सवेतन संपूर्ण सुविधाओं सहित प्रसूति अवकाश की गारंटी।

शिक्षा स्वास्थ्य सभी का जन्मजात बुनियादी अधिकार है। इसमें दोहरे मानदंडों वाली व्यवस्था खत्म करके इसे एक समान बनाया जाए एवं इसे केजी से पीजी तक सभी लोगों को निःशुल्क उपलबध कराने की गारंटी की जाए।
दो कानूनों को तत्काल बदलना-
क. सरकारी कर्ज को ’भूमि लगान’ की तरह वसूलने का कानून। यह कानून ईस्ट इंडिया कंपनी के राज में 1793 में लार्ड कार्नवालिस ने देश के आम किसानों को लूटने के लिए बनाया था। यह देश की गरीब ग्रामीण जनता के उत्पीड़न का आज भी एक बड़ा जरिया है।

ख. न्याय के बगैर कोई लोकतंत्र नही होता। देश के कानून में जमानत लेने के लिए संपत्ति की बाध्यता समाप्त करके सिर्फ नागरिक पहचान पत्र पर सबको जमानत दी जाए। यह कानून संपत्ति विहीन लोगों के लिए न्याय पाने की राह में बहुत बड़ी रुकावट है। यह कानून न्याय के बुनियादी भारतीय दर्शन और सिद्धांतों के भी उलट है।

ये पांचों सवाल देश की 90 प्रतिशत जनता के वास्तविक लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे हैं। हमारे लिए न्याय, लोकतंत्र और विकास एक दूसरे के पूरक हैं। इन सवालों के हल होने से देश का लोकतंत्र व्यापक होगा और वास्तविक बनेगा। इससे विकास की गति भी तेज होगी और मंदी के संकट से भी निजात मिलेगी। इसी प्रक्रिया में संपत्ति और सत्ता का विकेन्द्रीकरण होगा, उत्पीड़नकारी तानाशाही का अंत होगा और हम एक नए न्यायपूर्ण लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की ओर आगे बढ़ेंगे। आइए, मिलकर आगे बढ़ें।

आॅल इंडिया वर्कर्स कौन्सिल, ट्रेड यूनियन कौन्सिल (कानपुर), नागरिक परिषद।

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Pamphlet issued by Mazdoor Chetna Kendra

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