On the Jammu & Kashmir High Court staying a probe into the Kunan-Poshpora mass rape case (of 1991)

January 21, 2015

पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स
प्रेस विज्ञप्ति
21.01.15

 

दो दशक पुराने कुनन पश्पोरा मामले में पुनः जांच स्थगित – सैन्य बलों को प्राप्त दण्डमुक्ति का एक और उदाहरण

पी.यू.डी.आर. एक बार फिर इस देश में सैन्य बलों को मिली कानूनी दण्डमुक्ति के मुद्दे को चिन्हित करना चाहता है | 16 जनवरी 2015 को कुनन पश्पोरा बलात्कार मामले में जम्मू कश्मीर उच्च न्यायलय ने एक ऐसा निर्देश जारी किया जो इस बात की तरफ इशारा करता है की इस देश में सैन्य बलों पर उनके द्वारा कृत अपराधों के लिए किसी भी प्रकार की कार्यवाही चलाना कोई आसान बात नहीं है |

23 और 24 फरवरी 1991 की रात में 4 राजपुताना राइफल्स 68 ब्रिगेड के सैनिकों द्वारा उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के कुनन और पश्पोरा गावों में लोगों को यातनाएं दी गईं और कम से कम 40 से 53 औरतों का बलात्कार किया गया | घटना के लगभग 1 माह बाद 18 मार्च 1991 को आई.पी.सी. की धारा 376, 452, और 342 के अंतर्गत आर्मी के खिलाफ प्राथिमिकी दर्ज की गई | फिर 22 वर्ष बीत जाने के बाद 30 मार्च 2013 को पुलिस द्वारा सी.आर.पी.सी. की धारा 173 के अंतर्गत मजिस्ट्रेट को जांच रिपोर्ट तब जमा की गई जब 50 महिलाओं ने जम्मू कश्मीर उच्च न्यायलय में पी.आई.एल. दायर करने के लिए प्रक्रिया शुरू की | पुलिस के इस रवैय्ये को देखते हुए उच्च-न्यायलय ने प्रार्थियों को कुपवाड़ा कोर्ट में अर्ज़ी दायर करने की हिदायत की | 10 जून 2013 को प्रार्थियों ने पुलिस की जांच रिपोर्ट के खिलाफ विरोध याचिका दर्ज की | 18 जून 2013 को न्यायिक मजिस्ट्रेट ने तीन महीने में मामले की दोबारा जांच करने का निर्देश दिया था | पी.यू.डी.आर. ने इस मौके पर इस पूरे मामले का ब्यौरा लिखकर एक विज्ञप्ति भी जारी की थी | (देखें – http://www.pudr.org/?q=content/one-step-forward-uncertainties-ahead)

जून में दो दशक बीतने के बाद किसी एक मामले में सैन्य बलों के खिलाफ जांच के निर्देश दिए गए थे | लेकिन हालहि में उच्च न्यायलय द्वारा दिए गए निर्देश के बाद हम वहीँ आ पहुंचे हैं जहां से शुरु किया था | न्यायाधीश ताशी रब्स्तान द्वारा फिलहाल के लिए, दूसरे पक्ष की दलीलें सुनने तक, 18 जून के पुनः जांच के निर्देश को और 8 अगस्त का निर्देश (जो की 18 जून के निर्देश को स्वीकृति प्रदान करता है), दोनों को स्थगित कर दिया गया है | आर्मी द्वारा दलील रखी गई है की ‘एक्टिव सर्विस’ के दौरान कृत्यों की जांच सिर्फ आर्मी द्वारा ‘आर्मी एक्ट 1950’ के अंतर्गत ही की जा सकती है | आर्मी ने सी.आर.पी.सी. की धारा 173 के सन्दर्भ में मजिस्ट्रेट की शक्तियों पर कुछ सवाल उठाये हैं जैसे – क्या जांच रिपोर्ट जमा होने के बाद मजिस्ट्रेट साक्ष्य ले सकता है और क्या पुनः जांच के निर्देश दे सकता है ? क्या वह जांच रिपोर्ट की समीक्षा करते समय, राज्य मानव अधिकार आयोग की रिपोर्ट के ‘अमान्य’ निष्कर्षों के आधार पर आगे की कार्यवाही तय कर सकता है?

पी.यू.डी.आर. इस निर्देश की कड़ी निंदा करते हुए यह बात दोहराना चाहता है की आज भी भारत सरकार देश के सशस्त्र संघर्ष क्षेत्रों को संघर्ष क्षेत्र का दर्जा देने से इनकार करती है | साथ ही इन क्षेत्रों में मौजूद सैन्य बलों को उनके द्वारा कृत मानव अधिकार उल्लंघनों के लिए सज़ा से लगातार बचाव करती है | सैन्य बलों के लिए यह रक्षा कवच आफ्सपा और आर्मी एक्ट जैसे क़ानूनों के माध्यम से दिया जाता है | बलों पर आम कोर्ट में अभियोजन चलाने के लिए पहले केन्द्रीय सरकार से अनुमति की ज़रूरत पड़ती है | 1989 से 2011 की बीच जम्मू कश्मीर में तैनात भारतीय सेना के अधिकारियों और सैनिकों के खिलाफ कार्यवाही के लिए 44 आवेदन रक्षा मंत्रालय को दिए गए | रक्षा मंत्रालय द्वारा इनमें से 33 मामलों को खारिज कर दिया गया है तथा 11 मामले अभी भी अनुमति के लिए लंबित हैं | अगर दबाव के चलते कुनन पश्पोरा जैसा मामला कोर्ट के समक्ष आ भी जाए तो भी न्याय मिलना निश्चित नहीं होता जैसा की इस मामले का 25 वर्ष का इतिहास दर्शाता है| पी.यू.डी.आर. मांग करता है की सशस्त्र संघर्ष क्षेत्रों में सैन्य बलों को प्राप्त दण्डमुक्ति को वापस लिया जाए और इस मामले में पुनः जांच कर दोषियों को सज़ा दी जाए |

शर्मिला पुरकायस्थ और मेघा बहल

सचिव, पी.यू.डी.आर.