तुलसीराम : एक समाज वैज्ञानिक की याद में !

March 15, 2015

तुलसीराम : एक समाज वैज्ञानिक की याद में !

– चंद्रसेन

‘सर को अंतिम बिदायी कैसी दी जाय ? ये सवाल दिनांक 13 फरवरी से लेकर 14 फरवरी (2015) को शायद दूसरी बार भारतीय इतिहास में उठा होगा ? विद्धवान, अकॅडमीशियन, एक्टिविस्ट, मार्क्सवादी, अम्बेडकरवादी और बुद्धिस्ट तुलसीराम को अंतिम विधायी के तरीके को लेकर जो बहस छिड़ी थी वही बहस कबीर को लेकर भी थी ! अंतिम बिदाई भी क्या शानदार- उनकी बेटी ने जो उन्हें कन्धा दिया !

तुलसी राम भारतीय समाज के उस व्यवस्था की पैदाइश थे जहाँ समाज का एक हिस्सा इंसान होने का दर्जा पाने के लिए आज भी सड़क, संसद और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपना प्रोटेस्ट दर्ज करा रहा है !

मार्क्स के डायलेक्टिक्स, अम्बेडकर के शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो, बुद्ध के अप्प दीपो भव’ के सैंद्धांतों को तुलसीराम अपने जीवन में आत्मसात किया तथा इन्ही हथियारों से लैश होकर उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई को आगे बढ़ाया !

तुलसी राम उन विरलों में से एक हैं जिन्होंने हर प्रकार के अतिवाद को न सिर्फ नकारा है बल्कि लोकतांत्रीकरण, समाजीकरण और समतामूलक समाज की स्थापना के लिए ‘माध्यम मार्गी रास्ते को अपनाया ! यही गुण, प्रोफेस्सर राम को एक सवांदधर्मी भी बनाता है !

उनके लेखन और एक्टिविस्म में साफ दिखता है की जिन सामाजिक ताकतों के साथ वे अपनी लड़ाई को जोड़कर देखतें थे उनकी भी कड़ी आलोचना करने से नहीं चूकते थे, यदि उनके रास्ते, प्रोग्राम और विचारधारा गलत होती थी ! मार्क्सवादियों ने जाति को समझा ही नही ,मार्क्सवाद/ लेनिनवाद को भारतीय परिदृश्य में लागू नहीं किया गया है, दलितों को अपने तीन रामो ( राम विलास पासवान, रामदास अठावले और राम राज्य अर्थात उदित राज) से बचना चाहिए, दलितों को अब सारी दलित पार्टियों के खिलाफ आंदोलन करना चाहिए, ये कुछ ऐसी आलोचनाएँ है जो सिर्फ तुलसी राम हि कर सकते हैं ! ईश्वरवाद और पाखंडवाद पर तो उनकी आलोचना और तार्किकता कि तो कोई काट हि नहीं है ! ‘मै ईश्वर होने की परीक्षा लेने के लिए बनारस के तमाम मंदिरों की फेरी करने लगा और देवी देवतावों की मूर्तियों के सामने खड़ा हो कर उन्हें ढेर सारी गालियां देता और उनसे कहता यदि तुम हो तो मेरे खिलाफ दंडात्मक कार्यवाही करो !’

सामाजिक प्रधिबद्धता, त्याग, तार्किकता और मानवता का जो जीता जगाता स्वरूप आज हमारे सामने तुलसी राम के रूप में मिला, आज वह विलक्षण है ! निश्चय ही ऐसी पर्सनाल्टी का निर्माण उन्हें मार्क्सवादी चिंतन, आंबेडकर के विचारों और बुध की शरण में जाकर मिली है ! ऐसा वे मानते थे ! मार्क्स, आंबेडकर से लेकर बुद्ध तक की जो उनकी यात्रा थी वो निश्चय ही एक परिवर्तनगामी और सभ्य समाज की कल्पना के लिए अति आवशयक हैं ! वे ऐसे विरले बुद्धिजीवी थे जो भारतीय समाज में मूल चूल परिवर्तन के लिए इन्ही विचारो के मिश्रण पर जोर देते रहे !

आज जो संघ का चौतरफा हमला है और धार्मिकता और जातिवाद का जो गठजोड़ है उसपर सर की टिप्पड़ी बहुत ही सटीक बैठती है ! उनका मानना था कि ‘जो सांप्रदायिक होगा वह निश्चय ही जातिवादी होगा और जो जातिवादी होगा वह सांप्रदायिक जरूर होगा !’

मुर्दहिया से लेकर मणिकर्णिका और जे. न. उ. से रूस और अंतर्राष्ट्रीय राजनीती का सफर जो तुलसी राम का था वह निश्चय ही दुर्गम था लेकिन उसकी लड़ाई के जो हथियार, विचार, रास्ते और एक मुक्कमल समाज का सपना था वह निश्चय हि समानता, स्वतंत्रता, मानवता, और शोषणविहीन दुनिया की कल्पना पर आधारित है ! उनके कमिटमेंट और जिजीविषा और संघर्षों को याद करने की एक छोटी सी पहल !

चंद्रसेन, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
अंतर्राष्ट्रीय अध्ययन संस्थान
पी. एच. डी.