गडचिरोली घोषना पत्र

March 29, 2015

जन संघर्षोंकी राष्ट्रिय परिषद् (२२ २३ मार्च २०१५ गडचिरोली)

प्रस्ताव:

दिनांक २२ और २३ मार्च २०१५ को महाराष्ट्र राज्य के गडचिरोली में आयोजित “जन संघर्षोंकी राष्ट्रिय परिषद् २०१५” में परिषद् के अध्यक्ष मा. हिरामण वरखडे (माजी आमदार तथा जिल्हा संयोजक भारत जन आंदोलन, गडचिरोली) इनके अध्यक्षता में निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गए है.

१. इज्जत से जिने के संघर्ष में जुड़े देश भर के सारे जन संघर्षों के प्रति साझा समर्थन जारी किया गया. तथा प्राकृतिक संसाधनों के निरंकुश दोहन और लोकतांत्रिक प्रकियाओ के विरोधी तमाम औद्योगिक परियोजनायो के प्रति पुरजोर विरोध दर्ज किया गया. और संघर्षरत सभी जन आंदोलनों के प्रती एकजुटता दिखाई गयी.

२. पूंजीवाद को बढ़ावा देने और केवल कार्पोरेट लुट के लिए श्रम, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन तथा आदिवासी एवं समस्थ मेहनतकश किसान, दलित, महिला, अल्पसंख्यांक और श्रमिक वर्ग सम्बंधी कानूनों में बदलाव की प्रक्रिया का पुरजोर विरोध किया गया. और जन विरोधी कानूनों, नीतियों के विरोध में संघर्ष और भी तेज करने का निर्णय किया गया.

३. जनसहमति को नकारने वाले भू-अधिग्रहण का हम विरोध करते है. भू-अधिग्रहण कानून, २०१३ का किसान विरोधी एवं अन्य गैर-प्रजातांत्रिक प्रावधानों को हम ख़ारिज करते है. और प्रस्थावित भू-अधिग्रहण बिल २०१४ में और जनविरोधी नीतिया बनाने के प्रयासों का हम धिक्कार तथा इस कानून को निरस्त करते है. इसके साथ साथ जनविरोधी कोयला कानून, खनिज-खदान कायदा कानून इत्यादि कानूनों को पुरजोर विरोध करने के लिए आवाहन करते है.

४. जातिवाद एवं सांप्रदायिकता और पूंजीवाद के अंत: संबंधो को चुनौती देने और सांप्रदायिकता के आधार पर बटवारे कां प्रतिरोध करने का निर्णय किया गया.

५. ग्रामसभा के सर्वोच्च अधिकारोंको कायम करने तथा वन व्यवस्था को अधिक प्रजातांत्रित बनाये जाने के संघर्ष को तेज करना अनिवार्य हो गया है.

६. कार्पोरेट परस्त गैरकानूनी कोशिशो से सरकार बज आये तथा ग्रामसभा के सहमति के बिना किसी भी कंपनी या परियोजना को दिए गए जंगल, जमीं को निरस्त करे.

७. लघु वन उपज पर ग्रामसभा के अधिकार को मान्यता देकर, वनउपज पर उनके सम्पूर्ण स्वामित्व के संघर्ष को मजबूत किया जाये.

८. संघर्ष के लिए वैकल्पित निर्माण के रास्ते में संसाधनों का सामूहिक उत्पादन तथा नियोजन को बढ़ावा देना अनिवार्य है.

९. सामाजिक कार्यकर्ताओ और जनता पर लगे झूठे आरोपों और मुकदमो के विरुद्ध साथ मिलकर संघर्ष की जरुरत महसूस कर सभी फर्जी मुकदमो को तुरंत हटाया जाने के लिए संघर्ष जरी रखने का निर्णय लिया गया. तथा पुलिसीया दमन तथा बढ़ाते सैनकरण को पुरजोर विरोध करते है.

१०. मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा का माध्यम हो एवं सभी आदिवासियों की मातृभाषा को संविधानिक दर्जा दिया जाये तथा आदिवासियों के संघर्षशील इतिहास एवं समतामुलक सांस्कृतिक व्यवस्था को पाठ्यक्रम में लिया जाए.

यह जन संघर्षो की राष्ट्रिय परिषद् भारत भर के सभी जन संघर्ष आंदोलनों के प्रति हमारी एकजुटता दिखने का प्रयास है. इस परिषद् के लिये दस दिन पहले हि आवश्यक अनुमतियाँ ले ली गई थी. उसके बावजूद भारत जन आंदोलन तथा अखिल भारतीय आदिवासी महासभा के कर्यकर्तायो और उनके वाहनों को रोका गया. सिर्फ यही नहीं छत्तीसगढ़ से इस राष्ट्रिय परिषद् में सहभागी होने या रहे हमारे साथियों को महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ सीमा पर रोक दिया गया ताकि वे इस राष्ट्रिय परिषद् का हिस्सा न बन पाए. २३ मार्च २०१५ रैली और सभा के लिए सम्मिलित होते वाली जनता को जगह-जगह पर पुलिस थानों के पास जानबूझकर रोक गया. हमारे हजारो साथी इस कारन वश सभा में सम्मलित नहीं हो सके.

जन संघर्षो की राष्ट्रिय परिषद् में आए वक्ताओं, प्रतिनिधियों और अन्य साथियों के ऊपर हो रहे राजकीय दमन का पुरजोर विरोध करते है. जनता जानती है की सरकार कीर तरह हमारे संसाधन और हक़ छीन रही है और हमारे विरोध करने के हक़ भी हिंसा तथा दमन से दबा रही है.

पर हम हमारा संघर्ष जरी रखेंगे.

– जय सेवा… जय भीम… इल्कलब जिंदाबाद…

द्वारा –

महेश राउत, परिषद् समन्वयक

लिए, आयोजन समिति, जन संघर्षो की राष्ट्रिय परिषद्, गडचिरोली