सरकार नाकाम, राजनैतिक दल निष्क्रिय पर पूरे हौंसले से जूझती जनता

May 22, 2015

सरकार नाकाम, राजनैतिक दल निष्क्रिय पर पूरे हौंसले से जूझती जनता

नेपाल में भूकम्प प्रभावित क्षेत्रों की रिपोर्ट

नेपाल में 25 अप्रैल को आये भूकम्प जिसकी तीव्रता 7.9 थी जिसने नेपाल
में भारी तबाही मचायी। इस भूकम्प के कारण जहां कई हजार लोगों की जान चली
गयी। वहीं लाखों लोग बेघर हो गये। टीवी चैनलों के माध्यम से जितना दिखाया
जा रहा है नुकसान उससे कहीं ज्यादा है। टीवी चैनलों का मुख्य केन्द्र
जहां काठमाण्डू तक सीमित है जिसमें धरहरा टावर व कुछ ऐतिहासिक इमारतों पर
केन्द्रित रहा। लेकिन भूकम्प से प्रभावित वहां की आम मेहनतकश जनता जो कि
सबसे ज्यादा प्रभावित है किसी भी चैनल का ध्यान उसकी ओर नहीं है।

‘नागरिक’ व विभिन्न जनसंगठनों के सहयोग से बनी मेडिकल टीम ने नेपाल
में जाकर भूकम्प प्रभावित लोगों के इलाज के लिए कैम्प लगाये। नौ डाक्टरों
समेत सोलह लोगों की यह टीम नेपाल में दूर दराज के इलाकों में जाकर जहां
लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, उनका इलाज कर रही है। इस टीम ने नेपाल के
प्रगतिशील संगठनों के साथ मिलकर योजना बनाई और उनके सहयोग से सबसे ज्यादा
प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवायें उपलब्ध करा रही है। इस योजना में
दो टीमें बनायी गयी हैं। एक टीम ललितपुर जिले के घुसेल के इलाके में गयी
तथा दूसरी टीम धारदेव के इलाके में गयी।

पहली टीम ने घुसेल के झांगलकोट गांव में जाकर मेडिकल कैम्प लगाया।
मेडिकल कैम्प में सैकड़ों की संख्या में लोगों का इलाज किया गया। इस गांव
के नब्बे प्रतिशत से ज्यादा मकान इस भूकम्प में धराशायी हो गये। जिसके
नीचे दबकर चार लोगों की जान चली गयी तथा बहुत से मवेशी भी मारे गये।

इसी गांव के रहने वाले कुकु एवं दिनेश ने हमें पूरा गांव घुमाया।
पूरे गांव में अपवादस्वरूप ही कुछ घर बच पाये हैं जो बचे हैं। उनमें भी
दरारें पड़ गयी हैं। इस भूकम्प में कुकु के दादाजी की जान चली गयी। इसी
गांव के सुनाम के भाई, भाई की पत्नी एवं बच्चे समेत तीन लोगों की जान इस
भूकम्प में चली गयी। भूकम्प के कारण इतनी भारी तबाही होने के बाद सरकारी
मदद के नाम पर नाममात्र की ही सहायता उपलब्ध करायी गयी है। पंचकन्या नाम
की एनजीओ के माध्यम से बाल्टी, मग, चावल, दाल आदि बांटे जा रहे हैं।
ब्रेड कई दिन पुरानी थी जिस पर फफूंद लग गयी थी। जिसे एक व्यक्ति दिखा
रहा था। इतनी बड़ी तबाही के बाद जितनी जान माल की हानि हुयी है उसकी
तुलना में यह सहायता नाकाफी है। जिनके घर जानें गयी हैं, उन्हें अभी तक
कोई सहायता नहीं मिली है। जो मकान तबाह हुए हैं उनके लिए भी अभी कोई
सहायता नहीं मिली है। अभी तक सिर्फ वादे किये जा रहे हैं। कुकु के चाचा
कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। वह भी आये थे और सिर्फ वादे करके चले गये।

कुकु जिनकी पढ़ाई आठवीं तक है, काठमाण्डू में एक होटल में कुक का काम
करते हैं। आठ से दस हजार रुपये महीना कमा लेते हैं। जिसमें से उनके पांच
हजार रुपये मकान के किराये में चले जाते हैं। दिनेश गांव में ही रहकर
खेती करते हैं उनकी पढ़ाई नहीं के बराबर है। इन लोगों का कहना है कि सारी
पार्टियां जब चुनाव होता है तब आती हैं और वादा करके चली जाती हैं। काम
कुछ नहीं करती हैं। इस गांव में जाने के लिए कच्चा रास्ता है जो कि
काठमाण्डू से करीब तीन घंटे की दूरी पर है। प्राथमिक विद्यालय इसी गांव
में है तथा उससे आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें साढ़े छः किलोमीटर दूर जाना
होता है।

आम तौर पर इतनी तबाही के बाद लोग सदमे में चले जाते हैं। लेकिन इस
गांव में इतनी तबाही के बाद भी लोगांे के अंदर जज्बा कम नहीं हुआ है
बल्कि पूरे जज्बे के साथ अपनी दिनचर्या में लगे हुए थे। हमारी टीम का
उन्होंने दिल खोलकर स्वागत किया। बहुत थोड़े समय में हम लोग इस तरह घुल
मिल गये कि हम लोगों को लगा ही नहीं कि हम लोग कहीं और से आये हैं। ऐसा
लगा कि जैसे अपनों के बीच हैं। घुलने-मिलने में भाषाई दिक्कत कहीं आड़े
नहीं आयी बल्कि उस दिन हमारी टीम ने वहीं रात्रि विश्राम किया और शाम को
कई घंटे उनके साथ गीत भी गाये। हम लोगों के बीच दूरियों के बजाय अपनत्व
का भाव बहुत ज्यादा था।

अगले दिन हम लोगों की टीम यहां से करीब 100 किलोमीटर दूर ललितपुर
जिले के ही गिम्दी गांव में पहुंची। वहां जाने के लिए भी कच्चा मार्ग ही
था। वहां पहुंचने में हम लोगों को आठ घंटे से ज्यादा वक्त लग गया। रास्ते
में घुसेल में रुककर वहां की तबाही देखी। घुसेल में भी लगभग सारे मकान
धराशायी हो गये। वहां पर एक चाय की दुकान पर हम लोगों ने चाय पी। वहां
लोगों से बातचीत के दौरान हमें उन्होंने बताया कि बचाव कार्य के लिए सेना
जल्दी ही आ गयी और उसने अपना काम तुरन्त शुरू कर दिया। यहां पर प्राथमिक
स्वास्थ्य केन्द्र भी है। इस प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में दो एएनएम
एवं एक पुरुष हेल्थ वर्कर ही कार्यरत है। यहां पर कोई भी डाक्टर नहीं है।
यह यहां की स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल है यह समझने के लिए पर्याप्त
है। इस गांव में कोई जनहानि तो नहीं हुयी लेकिन बहुत से मवेशी मारे गये।

इसी बातचीत के दौरान लोगों ने बताया कि जिनके मकान गिरे हैं उन्हें
सरकार दो लाख का मुआवजा देने की बात कर रही है जबकि विपक्षी पार्टी नौ
लाख रुपये मुआवजे की मांग कर रही है। बातचीत के दौरान इस गांव के खेमराज
का कहना था कि जब जापान में इतने ज्यादा भूकम्प आने के बाद भी जानमाल की
हानि बहुत कम होती है तो यह नेपाल में क्यों नहीं हो सकता।

वहां से आगे चले तो रास्ते में देवीचैर में एक मेडिकल कैम्प दिखा जो
कि कस्बे के पास था। हम लोगों ने रूककर जानने की कोशिश की तो पता चला कि
यह कैम्प कोरिया की एनजीओ रोज क्लब चला रही है। उनका 5 दिन का कैम्प
चलाने का कार्यक्रम है। यह कैम्प वहां चला रहे हैं जहां भूकम्प का प्रभाव
अपेक्षाकृत बहुत कम है जो काठमांडू से मात्र 14 किलोमीटर की दूरी पर है।
दुगन में जहां नुकसान बहुत ज्यादा है वहां पर कैम्प लगाने की उनकी कोई
योजना नहीं है। इस भूकम्प से सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब लोग हुए हैं।
उनके मकान कच्चे बने हुए हैं। मिट्टी के गारे से पत्थरों को जोड़कर कच्चे
मकान बनाये हुए थे ये सारे मकान भूकम्प के झटके में धराशायी हो गये। इन
गरीब लोगों का मुख्य काम खेती करना एवं पशुपालन है। इस भूकम्प से आदमियों
के साथ पशुओं का नुकसान बहुत ज्यादा हुआ है। इस कारण उनके आय का एक मुख्य
स्रोत समाप्त हो गया है।

अगले दिन हम लोगों ने गिम्दी में कैम्प लगाया जहां कई लोगों का इलाज
किया। हम लोगों ने इस गांव को घूमकर देखा तो ज्यादातर कच्चे मकान धराशायी
हो गये हैं। और यहां का श्री नारायण उच्च माध्यमिक विद्यालय भी गिर गया
है। इस गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र है जो कि बंद मिला। यहां पर
बातचीत के दौरान जो तथ्य सामने आये उनसे पता चलता है कि क्रांति के बाद
बदलाव तो हुए हैं। महिलाओं की गैर बराबरी खत्म हुयी, छुआछूत खत्म हुयी
है। सड़क बनना शुरू हुआ है मोबाइल टाॅवर लग गये।

इस गांव में बड़े किसान नहीं हैं। छोटे और मंझोले किसान हैं। अधिकतम
दो बीघे से ज्यादा जमीन किसी के पास नहीं है। कुछ भूमिहीन किसान भी हैं
जो बंटाई पर खेती करते हैं।

इस गांव से लोगों को काम के लिए काठमांडू या और कहीं जाकर काम करना
पड़ता है। इसी गांव के अंग्ररेज थापा मगर से बातचीत में उन्होंने बताया
कि वे आठ साल मलेशिया में रह आये हैं। इनका कहना है कि मकान बनाने के लिए
कम से कम पांच लाख रुपये चाहिए।

एक महिला से बातचीत में एक बात यह सामने आयी कि एक अधिकारी अन्य थे
जो उनके मकान का मुआयना नाप कर ले गये हैं। अभी यह पता नहीं है कि कुछ
मिलेगा भी कि नहीं। मदद के नाम पर थोड़ा राशन जरूर मिला है। इस गांव में
कांग्रेस नेता आये थे और सिर्फ वादा करके चले गये। कोई मदद उन्होंने अभी
तक नहीं की। जबकि यहां से उसी की पार्टी चुनाव जीती है। दूसरी टीम जिसमें
कुछ डाॅक्टर और सहयोगी थे। ललितपुर के भारदेव ग्राम विकास समिति क्षेत्र
में गयी। ये क्षेत्र पक्की सड़क से जुड़ा था। यहां पर स्थानीय स्वास्थ्य
केन्द्र टीम ने कैम्प लगाया। 3-4 घंटे में 70-80 मरीज देखे। इस क्षेत्र
में कुछ घर टूट गये हैं लोग टेन्ट लगाकर रह रहे हैं। यहां पर ठीक-ठाक
मात्रा में राहत सामग्री पहुंच रही है। ग्रामीण समूहों में सामग्री वितरण
का ध्यान रखते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रत्येक को राहत सामग्री
पहुंचे। उन्होंने आरोप लगाया कि अलग-अलग पार्टियों के लोग अपने-अपने
लोगों तक सामग्री पहुंचाते हैं और गड़बड़ी पैदा करते हैं।

अध्यापक गोपाल ने बताया कि निकट के गांव नल्लू में एक घर गिरने से एक
ही घर से तीन लोगों की मौत हो गयी जिनमें दो बहनें तथा एक वृद्धा थी।
उसके बाद हमारी टीम एक अन्य ग्राम विकास समिति चैथरे गयी वहां पर भी
70-80 मरीज देखे। यहां पर टीम ने देखा कि ग्रामीण इस बात का ध्यान रखते
हैं कि जो व्यक्ति कष्ट में है उस तक राहत और उपचार कार्य पहले हो
क्योंकि इस क्षेत्र में नुकसान ज्यादा नहीं हुआ है। इसलिए ग्रामीणों ने
सरकार द्वारा कुछ लाख रुपये सहायता राशि इसलिए लेने से मना कर दिया कि इस
सहायता को वहां भेजा जाए जहां ज्यादा आवश्यकता है। ग्रामीणों का व्यवहार
बहुत ही सहयोगात्मक रहा। तथा हमने महसूस किया कि जनता की सामूहिकता के
ऊंचे स्तर के कारण ही नेपाल में क्रांति हुयी है।

नेपाल से विशेष संवाददाता

छपते-छपतेेें

12 मई को जब हमारी टीम नुवाकोट जिले के रूपलिंग और कुमारी ग्राम विकास
समितियों के क्षेत्र में मेडिकल कैम्प लगाने गयी थी जिसे रोल्पा (II) के
नाम से जाना जाता है तथा दूसरी ललितपुर से किसी दुर्गम स्थान को जाने के
लिए निकल रही थी तभी एक बार फिर तेज भूकम्प आया और उसने नेपाल के सामान्य
होते जन जीवन को एक बार फिर ध्वस्त कर दिया। 60 से ज्यादा लोगों की मौत
हो गयी। डर फिर वापस लौट आया। आम जनता सुरक्षित स्थानों की ओर लौटने लगी।
लोग गाडि़यों में, टैन्टों में, खुले स्थानों में रात गुजारने के लिए चले
गये।

कोई अफरा-तफरी में अपने परिजनों के हालचाल जानने के लिए भागने लगे तो
कोई उद्धार कार्य के लिए। काठमांडू, ललितपुर जैसे शहरों में भी सन्नाटा
पसर गया। लेकिन जो भी हो नेपाल की बहादुर जनता एक दूसरे के साथ खड़ी है
और अपनी सामूहिकता से इस आपदा से पार पा जायेगी।