The Next Incarnation of the Salwa Judum – A Critical Note

May 22, 2015

By Chandrika

The formation of Salwa Judum II was announced (by some local leaders) on the occasion of Narendra Modi’s visit to Dantewada, where he inaugurated a mega steel plant. Salwa Judum was originally conceived by the erstwhile UPA government and was funded by the multinational corporations. Modi government at the centre and BJP government at the state will now be presiding over the new incarnation of Salwa Judum.

The announcement is quite misleading – does it mean that Salwa Judum I was defunct? Perhaps it was disbanded after the death of Mahendra Karmna or was it the Supreme Court judgement which held that SPOs were unconstitutional and demanded their immediate disbanding in 2011? The fact is, Salwa Judum was never disbanded. A significant section had already morphed itself into Koya Commandos to escape the Court’s vigilance, and the rest were regularized as police personnel by the state government. Salwa Judum was always a frontal organization of state terror against peoples’ movement and it will remain the same in its new avatar. Salwa Judum I committed numerous murders, abductions, torture and rape; villages were burnt, villagers were forcibly sent to camps which were nothing less than open prisons. It is estimated that more than six lakh villagers were internally displaced.

Will history repeat itself? It is understandable why the politicians of all hues have remained silent about Salwa Judum. But what about the civil society? Is not formation of Salwa Judum II a contempt to Supreme Court judgement? Are we waiting for the next big massacre to happen? Working people have and will resist the state terror once again. Many tribal villagers have joined Maoists to resist this corporate lead war against the working people. Civil society must stand in solidarity with the peoples’ movement.

(An appeal to progressive sections of the society from CPI (Maoists) can be found here. [PDF])

यूपीए ने जिस सलवा-जुडुम की शुरुआत छत्तीसगढ़ राज्य के साथ मिलकर की थी.
अब उसे क्रमांक में लिखने की जरूरत आन पड़ी है. उसे सलवा जुड़ुम-1 कहा
जाएगा. क्योंकि बीजेपी शासन की मदद से सलवा-जुड़ुम -2 की शुरुआत करने की
घोषणा स्थानीय नेताओं द्वारा कर दी गई है. इन घोषणाओं से यह भ्रम पैदा
होता है कि सलवा-जुड़ुम -१ ख़त्म हो गया था. शायद उसे महेन्द्र कर्मा की
मौत के बाद ख़्त्म हुआ मान लिया गया हो या यह 5 जुलाई 2011 को
सर्वोच्चन्यायालय के न्यायमूर्ति सुदर्शन रेड्डी और एसएस निज्जर द्वारा
जो आदेश दिया गया था उसके बाद खत्म मान लिया गया रहा हो. आदेश में इसे
पूरी तरह से बंद करने को कहा गया था और सरकार को जनसंहारो में संलिप्त
बताया गया था. सलवा-जुडुम पर यह फैसला इसके शुरू होने के लगभग 6 साल बाद
आया था. इन 6 सालों में हत्या, बलात्कार और आगजनी की जाने कितनी घटनाएं
घटी. छः लाख लोग अस्त-व्यस्त हो गए और कई अपने गांव फिर कभी लौटकर नहीं
आए. राज्य के इस अभियान के खिलाफ उनमें से कई आदिवासी माओवादियों के साथ
भी जुड़े, वे लड़कियां भी जिनके भाई सलवा-जुड़ुम में शामिल थे. और उन्होंने
एक मजबूत विरोध जताया. क्या फिर से सलवा-जुडुम-2 का शुरू होना इन घटनाओं
का दुहराव होगा. क्या इतिहास खुद को दुहराता है. क्या यह सर्वोच्च
न्यायालय के आदेश की अवहेलना नहीं है. निश्चय ही यह सब सवाल जब तक हल किए
जाएंगे. जब तक इन पर नागरिक समाज से आवाज़ें उठनी शुरू होंगी कई कत्लेआम
कर दिए जाएंगे. जबकि यह सच है कि सलवा-जुडुम के बंद करने के आदेश के बाद
यह कभी बंद नहीं हुआ था. सरकार और विपक्ष के राजनेता इस पर पूरी तरह से
खामोश हैं. क्योंकि आदिवासियों के साथ होने वाले सुलूक में संसद का
पक्ष-विपक्ष एक साथ खड़ा है. भाकपा माओवादी ने इस पर अपनी प्रेस विज्ञप्ति
जारी की है जिसे यहां देखा जा सकता है.