बस्तियों का तोड़ना

August 1, 2015

झोपड़ी टूटने के बाद हमारे बहुत पैसे किराए मे चले जाते हैं. बच्चों का स्कूल का सामान

भी रातों रात बरबाद हो गया. अब जहाँ रहते हैं वहाँ से स्कूल दूर पड़ता है.”

 

हम लोग आज सुबह यहाँ जमा हुएले हैं, अपना अपना घर यहाँ मार्क किया है. मेधा ताई ने

बोला है सत्याग्रह करेंगे, लेकिन एकदम शांती से सत्याग्रह करेंगे.”

 

– “आप क्या माँगें रख रहें हैं?”

– “वैसे तो हमारी माँग है कि हमे इसी जगह पर झोपड़ी बनाने दी जाए, नही तो हम ये चाहते

हैं कि सरकार हमे बराबर मुआफ़ज़ा दे. हमारा काम भी यहीं से जुड़ा है, तो ये सिर्फ हमारे घर नही

उजाड़े हैं, रोज़ी का भी सवाल है.”

 

ये सारी (और अन्य) बातें मानखुर्द के मंडला से मई महीने के अंत मे उभर रही थीं जब मुझे वहाँ के लोगों से मिलने का मौका मिला. पिछली सुबह ही करीबन सात से आँठ सौ लोग उस ज़मीन पर फिर से लौट आए थे जहाँ से उन्हे 2004-05 के दौरान नियमित रूप से बाहर किया गया था. उच्छेद का विरोध कुछ देर तक पुरज़ोर भी रहा, लेकिन सरकारी दमन बढ़ता ही गया, और भिन्न प्रकार की हिंसा अपना कर सरकार लोगों को वहाँ से उजाड़ने मे कामयाब रही. उसके पश्चात भिन्न प्रकार की कानूनी कार्रवाईयाँ भी हुईं जिनमे कभी-कबार ये भी लगा कि फ़ैसला उजाड़े हुए लोगों के हित मे जा रहा है. लेकिन सरकार इसे महज़ गलतफ़ैमी सिद्ध करने मे हमेशा तत्पर रही है, यहाँ तक कि कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद फिर से बसे लोगों के घर फिर तोड़े गए. तमाम तरह की कानूनी मे फसने और तमाम तरह के विख्यात-कुख्यात लोगों को मिलने के बाद भी इस जुलाई महीने मे पिछले दस सालों मे तीसरी बार जमा लोगों के बसेरे उनकी आँखों के सामने तोड़े गए हैं, और चूँकी विरोध पर “शांती” और “अहिंसा” की बाधाएँ लग चुकी थीं, विवशता सामान्य थी. केवल सत्याग्रहियों का पंडाल रहने दिया गया, जिसमे मंडला से उजाड़े गए लोगों के अलावा एन.ए.पी.एम, आर.पी.आई, और आ.आ.पा के लोग भी म़ौजूद थे.

ऍक्टिविस्टों – जिनमे हटाए गए लोगों मे से कुछ चुनिंदा प्रतिनिधि भी हैं – का दावा है कि मसला सिर्फ घर या ज़मीन मिलने तक सीमित रखा जाए, तो कुछ आसान पैतरों से हल किया जा सकता है: सर्वे करवाना, लोगों के निवास के प्रमाण-पत्र दिखाना, कानूनी मे याचिकाओं, इ. मे लगना. बावजूद इस बात के कि दस साल के बाद भी “लड़ाई जारी है”, या सरल शब्दों मे कहा जाए, तो सोच/दिशा मे कुछ कमी है. “सांविधानिक अधिकार”, “गणतांत्रिक अधिकार”, “शांतिपूर्ण सत्याग्रह” – ये सारे दावे दो बातों पर आधारित हैं. पहली बात, कि संविधान, महानगरपालिका, पुलिस और रक्षा दल, कानून-कचहरी, इत्यादी, जो कल घर तोड़ने आए थे, आज हमारे घर हमे बसाने के लिए “अनुमति” देंगे. जिस किसी को पूछो वह जानता है कि ये सारे पैतरें गणतंत्र नही, रईसों के हित मे हैं, फिर क्यों सारी आँखें इन पर टिकी हैं या टिकाई जा रही हैं? दूसरी बात ये कि ये दावे किस तबके के लिए काम आते हैं? देखा गया है कि उस तबके के लिए जिसे किसी तरह शहर का ‘कानूनपसंद’ तबका माना जाता है, जो बिल्डिंगों मे रहता है, जिसकी स्थाई नौकरियाँ हैं, उस तबके के पास केस लड़ने, रहने का अलग बंदोबस्त करने, बच्चों की देख-भाल, इत्यादी जुटाने के तरीके भी हैं. तो क्या इन तरीकों को मंडला या अन्नाभाऊ साठे नगर पर थोपने से नए रास्तों पर रोक नही लग जाएगी? ये आलोचना जायज़ है कि मंडला के लोग भी इसी आंदोलन का हिस्सा हैं, लेकिन ये समझना ज़रूरी है, क्यों: जब घर टूटते हैं और ऑप्शन गायब होते दिखते हैं, तो विवशता भी बहुत बढ़ जाती है. ऐसे मे दो संभावनाएँ सामने आती हैं: या तो कोई नया रास्ता खोजा जाए, या तो ऐसे आश्वासनों पर विश्वास बनाया जाए जो कभी न कभी “न्याय” दिलाने का दिलासा देते हों. यही दिलासा मंडला और कई और बस्तियों के लोगों को एन.ए.पी.एम और दूसरे राजनैतिक दल दे रहे हैं. ये दिलासा कितना खरा है, ये अगर अब तक साफ़ नही है तो बहुत देर तक धुंधला नही होगा.

इस समस्या की जड़ तक अगर पहुँचना हो तो हमे मंडला के कुछ दृश्यों पर फिर नज़र डालनी चाहिए. होम गार्ड और पुलिस के आलावा एक नई प्रकार की ‘सुरक्षा’ मंडला मे हर वक्त तैनात है: प्राईवेट कंपनियों के लिए काम करते सेक्युरिटि गार्ड. जो कहानी अन्नाभाऊ साठे नगर के संतोश थोराट (जो कि होम गार्ड मे थे) की है, वही इनकी भी है: ऐसी सुरक्षा दल का भाग होना जिसका काम अपनी या अपने जैसे दूसरों की झुग्गियाँ तोड़ना, बँकों-ए.टी.एमों की सुरक्षा, फ़ैक्टरी-ऑफ़िसों मे प्रशासन का चाबुक बनना, इत्यादी. लेकिन जब एक प्राईवेट कंपनी के पास इतनी पूंजि होती है कि वह बड़ी तादाद पर लोगों को रख सके, तो संतोश थोराट जैसे अकेले कदम उठा पाना (नौकरी त्यागना) कम ही दिखता है. ये एक तरह से अर्थव्यवस्था के नए और पुराने हिस्सों मे टकराव है. मंडला मे रहनेवालों मे से अधिकतर दिहाड़ी कामगार या छोटी वर्कशॉप मे काम करते मजदूर हैं, कोई टेलर, कोई वेल्डर, कोई मछली बेचने-वाला. बहुत बड़ा तबका ऐसा है जो महीने मे 3000 से 6000 के दायरे मे कमाता है दिन के बारा घंटे काम के बाद, और बाकी समय मे भी कुछ न कुछ काम करके आमदनी बढ़ाता है. इस दायरे के बीच मे भी महीने से महीने वेतन कम-ज़्यादा मिलता है, क्योंकि काम कम-ज़्यादा होता है. इसके सामने नई अर्थव्यवस्था को देखिए: बड़े काँट्रॅक्टरों का आना, इसी विवश तबकों मे से लोगों को काम पर लेना, कपड़ा-मंड़ी मे बड़ी कंपनियों की बाढ़, मेटल-वर्क्स मे बड़ी कंपनियों की बाढ़, मछली पकड़ने मे बड़े ट्रॉलर्स की बाढ़, मछली बिकरी मे सुपरमार्किट व फ़्रोज़न फ़ुड्स का प्रचलन. याने कि रोज़गार के पुराने तबके का नए के कारण कमज़ोर होना. कई लोग आरोप लगाते हैं कि सरकार बिल्डर लॉबी की पक्षधर है और इसी लिए ज़मीन खींच रही है; ये आरोप अधूरा है. सरकार और बिल्डर लॉबी दोनो ही ज़मीन-मंडी के गुलाम हैं, इसलिए अपने आप से विवश. जो ज़मीन बीस या तीस साल पहले मूल्यहीन थी, आज शहर के बढ़ने से बहुत महंगी हो गई है. मुम्बई, नवी मुम्बई, दिल्ली, गुड़गाँव और अन्य शहरों मे कॉर्पोरेट ऑफ़िसों की भरमार होने से बड़ी रकम देकर घर खरीदने/किराए पर लेने वाला एक बड़ा तबका उभर है. जब घर बसाने और घर उजाड़ने का मामला इस पूरे जाल मे फँसा हो, तो कोई कैसे मान ले कि घर वापस भी मिलेगा, और ज़िंदगी फिर अच्छी होगी?

इन आंदोलनों के चलते एक ऐसी बात भी सामने आती है जो साफ़ साफ़ कही नही जा रही: इन पिछले बीस वर्षों मे मुम्बई के नालासोपारा, उल्हासनगर, विख्रोली, तुर्भे, और न जाने कितनी जगहों पर बस्तियों की बहार हुई है. फ़र्क सिर्फ इतना है कि ये आंदोलन उन्ही जगहों तक सीमित हैं जो “शहर” के दायरे के अंदर पड़ते हैं. इसका मतलब कि आंदोलन वहीं तक सीमित है जहाँ बस्तियाँ तोड़ी जा रही हैं. तो ये पूछना लाज़मी है कि क्या ये सवाल बस्तियों का है, बस्तियों मे रहनेवालों का है, या फिर महँगी ज़मीन का है? ऐसा क्यों होता है कि सवाल तब पूछे जाते हैं जब घर तोड़े जा रहे हैं, और ना कि तब जब लोग घर बसा रहे हैं और बसर कर रहे हैं? सत्ता-मंड़ी मे हो रहे रोज़ाना दमन के बजाए अपना ध्यान सिर्फ़ सरकारों की अचानक की जानेवाली हिंसा पर क्यों लगाते हैं?

मंडला के बारे मे कुछ लेख यहाँ भी पाए जाएँगे, जिनसे ली गई सूचना के लिए आभार व्यक्त करता हूँ:

https://moonchasing.wordpress.com/2011/01/02/invisible-cities-part-five-a-place-called-mandala/
जावेद इकबाल

http://napm-india.org/content/upadate-mandala-struggle-houses-demolished-not-sprit-struggle-hosuing-right-will-continue
एन.ए.पी.एम

प्रतीक अली
pratikali4u@gmail.com
9654654605