रिहाई मंच ने जारी की महमूदाबाद कोतवाली में हुई जीनत मौत प्रकरण की जांच रिपोर्ट

August 29, 2015

RIHAI MANCH
For Resistance Against Repression
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पुलिस को ठहराया कसूरवार, प्रशासन की भूमिका पर सवाल, सीबीआई जांच की मांग

लखनऊ, 23 अगस्त 2015। रिहाई मंच ने 11 अगस्त 2015 को महमूदाबाद कोतवाली,
सीतापुर में हुई 18 वर्षीय युवती जीनत की मौत प्रकरण पर अपनी जांच
रिपोर्ट जारी करते हुए पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच की मांग की है।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने जारी विज्ञप्ति में कहा है कि
प्रथम दृष्टया की हत्या का मामला लगने वाली इस घटना में पुलिस की भूमिका
संदिग्ध है जिस पर जांच रिर्पोट में आठ अहम सवालों के जरिए पुलिस की
थ्योरी पर सवाल उठाए गए हैं जिसमें पुलिस ने दावा किया था कि युवती ने
आत्महत्या किया था। जांच दल में मोहम्मद शुऐब, राजीव यादव, अनिल यादव,
मसीहुदीन संजरी, शाहनवाज आलम, जियाउद्दीन, हरे राम मिश्र शामिल थे। जांच
रिपोर्ट में मौका मुआयना, आस-पास के लोगों की बातचीत, परिजनों का पक्ष,
पुलिस अधिकारियों के बयानों, परिस्थितिजन्य तथ्यों के विश्लेषण, आला
प्रशासनिक अधिकारियों के पक्ष, मीडिया रिपोर्टस् के आधार पर निष्कर्ष
निकाले गए हैं।

जिसमें कहा गया है कि कोतवाली के टाॅयलेट में मिले जीनत के शव और उसके
द्वारा 6 बजे से 6 बजकर 20 मिनट के बीच आत्महत्या करने के पुलिस के तथ्य
को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से आए सीएमओ सीतापुर के बयान कि
पोस्टमार्टम जो कि 8 बजे रात से शुरू हुआ था के 18 घंटे पहले उसकी मौत हो
चुकी थी, खारिज कर देता है। तो वहीं जब पुलिस खुद कह रही है कि मृतका 5
बजकर 55 मिनट पर कोतवाली पहंुच गई थी तो 6 बजे मृतका के पिता द्वारा अपनी
लड़की के बारे में कोतवाली में पूछने पर उसे कुछ न बताना और 6 बजकर 20
मिनट पर जब पुलिस ने लड़की की टाॅयलेट में मौत हो जाने की पुष्टि की उस
वक्त भी मृतका के पिता जो फिर वहां आए और उसके बाद 7 बजे तीबारा आए तब भी
उसके बारे में न बताना पुष्ट करता है कि पुलिस तथ्यों को मृतका के पिता
से छुपा रही थी। तो वहीं पोस्टमार्टम के हवाले से मृतका की मौत जब लगभग
दो से तीन बजे के बीच हो चुकी थी तो पुलिस की कहानी के पात्र चीनी मिल
कर्मचारी अमर सिंह, वन विभाग चैकीदार यासीन, पुलिस सिपाही ब्रहृमदेव
चैधरी, होमगार्ड रामइकबाल और कोतवाली में मौजूद चैकीदार शिवबालक और अपने
को टाॅयलेट में मृतका द्वारा फांसी लगाए जाने के बाद उसे देखने वाले
प्रत्यक्षदर्शी कोतवाल रघुबीर सिंह समेत अन्य पुलिस वालों की कहानी पर
सवाल उठ जाता है कि आखिर क्यों रात दो-तीन बजे के बीच हुई मौत को वे सब
सुबह 6 बजे के तकरीबन बता रहे हैं या फिर उसकी कहानी बना रहे हैं। वहीं
जांच टीम को मालूम चली कही सुनी बातें कि लड़की रात दो-ढाई बजे के करीब
थाने के गेट से बाहर नग्न अवस्था में भागने की कोशिश कर रही थी जिसको
चार-पांच पुलिस वाले पकड़कर कोतवाली के अंदर ले गए की पुष्टि पोस्टमार्टम
रिपोर्ट से मृतका की मौत का समय और उस टाॅयलेट में मृतका द्वारा लगाई गई
फांसी की पुलिस की झूठी कहानी जिसमें फांसी लगाना कहीं से भी मुमकिन नहीं
हो सकता जहां पुलिस की पूरी कहानी पर सवाल उठाता है वहीं इस बात पर भी
सवाल उठाता है कि रात में हुई मौत को आखिर पुलिस क्यों सुबह हुई मौत बता
रही है। जबकि परिस्थितिजन्य साक्ष्य जीनत के साथ हुए बलात्कार और हत्या
की ओर इंगित करते हैं। ऐसे में कोतवाली की पुलिस इस घटना में संलिप्त है
वहीं इस घटना के इतने दिनों बाद भी जिला व प्रदेश स्तर पर शासन व प्रशासन
स्तर पर पुलिस की कहानी को ही जबरन सच साबित करने की कोशिश हो रही हो तो
राज्य की किसी भी एजेंसी द्वारा इस घटना की निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती।
निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है जिसको पाने का हक हर पीडि़त व
इंसाफ मांगने वाले का हक है। उसी अधिकार के तहत हम मांग करते हैं कि इस
घटना की सीबीआई जांच कराई जाए।

द्वारा जारी-
शाहनवाज आलम
(प्रवक्ता, रिहाई मंच)

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महमूदाबाद (सीतापुर) कोतवाली में हुई ज़ीनत की मौत प्रकरण पर जांच रिपोर्ट

घटना
11 अगस्त 2015, दिन मंगलवार को कोतवाली महमूदाबाद, सीतापुर में जीनत नाम
की 18 वर्षीय लड़की की थाने के टाॅयलेट में कथित तौर पर फांसी लगा लेने
की बात सामने आई। जिसमें पुलिस की भूमिका को संदिग्ध मानते हुए स्थानीय
लोगों ने पुलिस पर हत्या का आरेप लगाते हुए प्रदर्शन किया जिसमें नदीम
नाम के युवक की पुलिस की गोली से मौत हो गई।

पुलिस का दावा
पुलिस की लम्बी चैड़ी और कई पात्रों वाली कहानी के मुताबिक वह
‘विक्षिप्त’ लड़की शारदा नहर के पास सुबह चार बजे अमर सिंह नामक चीनी मिल
कर्मचारी को मिली थी जिसने उसे वन विभाग के चैकीदार यासीन तक पहंुचाया।
जिसने उसे सिपाही ब्रम्हदेव और होमगार्ड रामइकबाल को सौंप दिया जो उस
लड़की को सुबह 5 बजकर 55 मिनट पर टैम्पो से कोतवाली ले आया। जांच दल को
कोतवाल रघुवीर सिंह ने बताया कि विक्षिप्त सी यह लड़की सम्भवतः आत्महत्या
करने के मकसद से वहां गई थी। वहीं लड़की के पिता मकबूल के मुताबिक सुबह
करीब चार बजे जब वे नमाज पढ़ने के लिए उठे तब घर से लड़की को लापता देख
कर और आस-पास खोजबीन करने के बाद वह सुबह करीब 6 बजे पहली बार कोतवाली
पहंुचे और पुलिस से अपनी बेटी के बारे में पूछा और कोई जवाब न मिलने पर
उसके गायब होने की मौखिक सूचना दी। पिता के मुताबिक वह इसके बाद दूसरी
बार 6 बजकर बीस मिनट और तीसरी बार 7 बजे भी थाने गए थे। लेकिन आखिरी बार
यानी 7 बजे उन्होंने थाने पर काफी भीड़ देखी जहां काफी गाडि़यां खड़ी
थीं, जिसके चलते वे वापस चले आए कि ऐसे में उनकी कोई सुनवाई नहीं होगी।
सवाल उठता है कि जब लड़की 5 बजकर 55 मिनट पर थाने पहंुच गई थी और उनके
पिता 6 बजे थाने पहंुच गए थे तब उनसे पुलिस ने यह बात क्यों छुपायी कि
वहां उनकी बेटी नहीं है ? जबकि जांच दल को तथ्यों से अवगत करा रहे कोतवाल
रघुबीर सिंह ने इस बात की पुष्टि की कि उस दिन सुबह चैकीदार शिवबालक जब
लड़की को शौच के लिए ले गया और दरवाजा नहीं खुलने पर उसने अन्य पुलिस
कर्मियों को बुलाया तो वह भी कोतवाली के पास स्थित अपने आवास से आए और
लड़की के शव को देखा।

इसी तरह, पुलिस के मुताबिक लड़की थाने में पहंुचने के लगभग 5 मिनट के
अंदर ही शौच करने गई, जिसे चैकीदार शिवबालक ले गया। जहां, शिवबालक के
मुताबिक लड़की ने हैंडपाईप से बाल्टी में पानी भरा और वह टाॅयलेट में चली
गई। शिवबालक के मुताबिक वह टाॅयलेट के बाहर ही लगभग 5-7 फिट की दूरी पर
खड़े रहे। लेकिन लगभग 15 मिनट बाद उन्होंने लड़की को आवाज दी जिस पर कोई
प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर उन्होंने पुलिस कर्मियों को आवाज दी जिन्होंने
दरवाजे, जिसमें अंदर से सिटकनी नहीं थी और जो बाहर की तरफ ही खुलता है,
को खोला जिसमें लड़की टाॅयलेट के रोशनदान जो तकरीबन 6 फिट ऊंचाई पर है,
की जाली से अपने दुपट्टे के सहारे लटकी मिली। शिवबालक के मुताबिक
उन्होंने लड़की के अंदर जाने के बाद किसी तरह की कोई आवाज नहीं सुनी।

यहां कुछ अहम सवाल उठते हैं-

1- यह कैसे सम्भव है कि कोई व्यक्ति 5-7 फिट की दूरी पर खड़ा हो और
आत्महत्या करने वाले की किसी हरकत या आहट की आवाज उसको सुनाई न दे?
क्योंकि आत्महत्या चाहे जिनती भी दृढ़ निश्चय से की जा रही हो मरते वक्त
इंसान अपने को बचाने की हर सम्भव कोशिश करता है। उसके मुंह से चीख निकलना
स्वाभाविक है, उसका हाथ-पैर पटकना स्वाभाविक है जिससे लड़की के पैर के
पास रखी बाल्टी से पैर टकराना लाजिमी होता, जिससे वह गिर जाता या टकराकर
सरक जाता। इन दोनों परिस्थतियों में आवाज उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
जिसकी आवाज 5-7 फिट दूरी पर खड़े चैकीदार की कानों तक नहीं पहुंचती, यह
मुमकिन ही नहीं है?

2- अगर पैर बाल्टी से नहीं टकराता तो जितना छोटा टाॅयलेट है उसमें बाल्टी
के बगल में मौजूद टाॅयलेट के दरवाजे से पैर टकराना स्वाभाविक था जिससे
दरवाजा जो सिटकिनी नहीं होने के कारण अंदर से बंद नहीं था, निश्चित तौर
पर खुल जाता है। लेकिन पुलिस के मुताबिक आश्चर्यजनक रूप से ऐसा कुछ भी
नहीं हुआ। जो पुलिस की कहानी पर सवाल उठाता है।

3- लड़की की लम्बाई लगभग पांच फिट से कुछ ज्यादा है जबकि टाॅयलेट की छत
की उंचाई तकरीबन 7 फिट है। जबकि रोशनदान का वह छेद जिसमें फंदा बंधा है
छत से करीब एक फिट नीचे है। इसतरह गले में बंधे फंदे और रौशनदान के छेद
में बंधे फंदे के दूसरे सिरे की बीच की दूरी यानी फंदे की लम्बाई तकरीबन
ढ़ाई-तीन फिट है। इसतरह गले जिसमें फंदा बंधा है और फर्श जिस पर लड़की का
घुटना टिका है की अधिकतम दूरी तीन-साढ़े तीन फिट से ज्यादा नहीं है। ऐसे
में सवाल उठता है कि क्या एक पांच फिट लम्बाई वाली लड़की तीन फिट लम्बे
फंदे से लटक कर मर सकती है, वह भी तब जब उसका घुटना पूरी तरह से फर्श पर
हो? शव की स्थिति को देखते हुए प्रश्न उठता है कि यदि जीनत ने खड़े होकर
जाली और गले में फंदा बांधा तो गले का फंदा साढ़े चार फिट के स्थान पर
तीन-साढ़े तीन फिट की दूरी पर कैसे आ गया। उस तस्वीर से यह संभव है कि
जीनत ने फांसी बैठकर लगाई हो लेकिन ऐसी स्थिति में गले पर जोर पड़ना संभव
नहीं है। जिससे उसकी मृत्यु कारित हो।

4- मृतका की संचार माध्यमों में आई तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि
मृत लड़की की गरदन दीवार से सटी हुई है और बहुत हल्की सी लटकी हुई है।
जांचदल को घटना स्थल का मुआयना कराने वाले कोतवाली के सिपाहियों का कहना
है कि लड़की ने अपने दुपट्टे का फंदा बनाकर रोशनदान की जाली में बांधकर
अपने शरीर के वजन का दबाव बनाकर अपने गले में लगे फंदे को टाईट कर दिया
जिससे उसकी मौत हो गई। लड़की की तस्वीर और पुलिस के बयान दोनों एक ही
दिशा में जाते हैं पर ऐसे फांसी लगाकर कोई आत्महत्या कर सकता है यह
स्वाभाविक नहीं है। क्योंकि लड़की का शव घुटनों के सहारे टिका है? यह एक
ही स्थिति में संभव है जब लड़की के गर्दन में फंदा बांधकर जाली के दूसरी
ओर से खींचा जाए और कुछ लोग लड़की को पकड़कर नीचे की तरफ दबाव बनाए? इस
तर्क का समर्थन मृतका की तस्वीर और पुलिस के बयान दोनों करते हैं। या फिर
दूसरी स्थिति यह है कि वह लड़की पहले मर चुकी थी जिसके शव को वहां लाकर
दीवार के सहारे खड़ाकर फांसी का फंदा बनाकर उसके आत्महत्या करने के प्लाट
को बनाया गया। ऐसे में दोनों स्थितियों में यह पुलिस की कहानी के न सिर्फ
विपरीत जाता है बल्कि पुलिस की आपराधिक भूमिका पर भी सवाल उठा देता है कि
ऐसी कौन सी परिस्थितियों ने पुलिस को ऐसा करने पर मजबूर किया।

5- मृत लड़की के पिता ने लड़की के शव के पैरों में चप्पल न होने के सवाल
पर जांच दल को बताया कि सुबह उन्हें अपनी बेटी का एक चप्पल उनके घर के
प्रांगण मंे मिला तो वहीं दूसरा सड़क पर पड़ा मिला। ऐसा किन परिस्थतियों
में हुआ होगा यह कह पाना मुश्किल है। लेकिन ऐसा होने की एक वजह यह हो
सकती है कि उसने घर से बाहर निकलने के बाद अपना एक चप्पल प्रांगण में
छोड़ दिया हो और दूसरा सड़क पर छोड़ दिया हो। लेकिन ऐसा उसने क्यों किया
होगा, यह नहीं कहा जा सकता। दूसरी वजह यह हो सकती है कि उसे किसी ने सड़क
से जबरन उठाया हो और उसका चप्पल निकल गया हो, और इस कृत्य के साक्ष्य
मिटाने के उद्येश्य से लड़की का एक चप्पल प्रांगण के अंदर फेंक दिया गया
हो और जल्दबाजी और अफरातफरी में दूसरा चप्पल वहीं छूट गया हो।

वहीं पुलिस का यह कहना कि लड़की को जिस शारदा नहर के पास से पाया गया
वहां अक्सर लोग आत्महत्या करने के मकसद से जाते हैं और चूंकि लड़की
विक्षिप्त और काफी डिप्रेसन में लग रही थी, अपना नाम और पता बार-बार गलत
बता रही थी इसलिए यह मानकर कि लड़की आत्महत्या के इरादे से वहां गई हो
उसे फौरन वहां से अमर सिंह नाम के एक चीनी मिल कर्मचारी ने हटा दिया और
वन विभाग के गार्ड यासीन को सौंप दिया। पुलिस की इस कहानी के मुताबिक
लड़की के पास एक पाॅलीथीन बैग था जिसमें एक जोड़ी सूट और सौ रूपए थे।
यहां सवाल उठता है कि अगर लड़की सचमुच आत्महत्या के मकसद से नहर की तरफ
गई थी तो उसने सड़क पर सिर्फ चप्पल क्यों छोड़ दिया उसने कपड़ों का
पाॅलीथीन बैग भी क्यों नहीं फेंक दिया? जीवन से ऊब चुका कोई आत्महत्या
करने पर आमादा व्यक्ति सिर्फ चप्पल छोड़ देगा और कपड़ा और सौ रूपए को
जरूरी सामान समझकर क्यों अपने पास रख लेगा ? इस तथ्य की रोशनी में लड़की
के नंगे पांव थाने पहंुचने की कहानी पर गम्भीर सवाल उठते हैं?

6- घटनास्थल पर मौजूद होने के बावजूद लड़की के पिता से शव के पंचनामें पर
क्यों नहीं हस्ताक्षर करवाया गया?

7- कुछ अखबारों में यह बात छपी कि लड़की के पिता ने पुलिस को यह लिख कर
दिया है कि उसने आत्महत्या की है। लेकिन जांच दल को मृतका के पिता ने
बताया कि उसने पुलिस को ऐसा कुछ भी लिख कर नहीं दिया है। ऐसे में सवाल
उठता है कि मृतका के पिता द्वार ऐसी तहरीर दिए जाने की बात किस आधार पर
छपी? जब पिता ने ऐसी कोई तहरीर दी ही नहीं तो पुलिस ने अखबारों में छपी
इस खबर का खंडन क्यों नहीं किया कि उसके पास ऐसी कोई तहरीर नहीं है? यहां
इस बात की भी सम्भावना नहीं बचती कि पिता ने पहले तो पुलिस को यह लिख कर
दे दिया हो लेकिन बाद में मुकर गया होे क्योंकि पुलिस की कहानी के ही
मुताबिक लड़की के थाने में आत्महत्या कर लेने के करीब चार घंटे बाद उसके
पिता को उसके घर से जबरन थाने उठा ले जाने के बाद थाने पर दी गई। यानी
किसी भी परिस्थिति में पिता तो यह कह ही नहीं सकता कि उसकी बेटी ने
आत्महत्या की क्योंकि वह वहां मौजूद ही नहीं था। ऐसे में यह मानने की कोई
वजह नहीं हो सकती कि ऐसी खबर पुलिस ने ही प्लांट करवाई हो ताकि इसे प्रथम
दृष्टया ही संदिग्ध लग जाने वाली ‘मौत’ में पुलिस पर सवाल न उठे।

8- स्थानीय सीएमओ डाॅ हरगोविंद सिंह द्वारा पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट के
हवाले से यह बताया जाना कि लड़की की हत्या पोस्टमार्टम होने से 18 घंटे
पहले हो गई थी अपने आप में पुलिस की कहानी पर सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि
पोस्टमार्टम रात को 8 बजे हुआ था इस लिहाज से मौत का वक्त रात को लगभग दो
से तीन बजे के बीच आता है। जबकि पुलिस का कहना है कि लड़की की मौत सुबह 6
बजे के करीब हुई।

कुछ अन्य तथ्य और लोगों की प्रतिक्रियाएं जो पुलिस की भूमिका को संदिग्ध बनाती हैं।

1- जिन लोगों ने कोतवाली के अंदर पुलिस की थ्योरी कि यह आत्महत्या का
मामला है का विरोध किया और पुलिस पर लड़की के साथ बलात्कार कर हत्या कर
देने का आरोप लगाया और थाने में मौजूद पुलिसकर्मियों की भी भूमिका की
जांच की मांग की उन्हें उनके घरों से रात को उठा ले जाना। जबकि वे घटना
के सामने आने के बाद हुए प्रदर्शनों में शामिल भी नहीं थे क्योंकि अगर
ऐसा होता तो गिरफ्तारी, जो उनके पकड़े जाने से काफी पहले ही शुरू हो चुका
था, अपने घर में नहीं सो रहे होते।

2- मृतका को टायॅलेट तक पहंुचाने और टायॅलेट से 5-7 फिट की दूरी पर खड़े
होने के बावजूद चैकीदार शिवबालक द्वारा किसी तरह की कोई आवाज न सुनने की
अस्वाभाविक लगने वाली बात पर जांच दल द्वारा पूछताछ करने पर शिवबालक का
जवाब देने के बजाए यह गुहार लगाना कि उनके छोटे-छोटे बच्चे हैं और उन्हें
कुछ भी नहीं मालूम, भी पुलिसिया कहानी को संदिग्ध बना देता है। क्योंकि
यदि शिवबालक सच बता रहे थे तो उन्हें अपने बच्चों के भविष्य की चिंता
करने और कुछ भी नहीं जानने की गुहार लगाना तार्किक नहीं है।

3- जांच दल को अपना नाम न बताने की शर्त पर घटना स्थल के आस-पास व कस्बे
के लोगों ने बताया कि लड़की को रात में दो-ढ़ाई बजे के करीब शोर मचाते
हुए बिल्कुल नंगी अवस्था में थाने के गेट से निकलकर भागने की कोशिश करते
हुए देखा गया जिसे चार से पांच पुलिस वाले वापस पकड़ कर अंदर लेकर चले
गए। अपने आप में कही सुनी ऐसी बातों को जांच रिपोर्ट में तथ्यों के रुप
में शामिल करने का निर्णय जांचदल ने तब लिया जब पोस्टमाॅर्टम रिपोर्ट के
हवाले से सीतापुर सीएमओ का बयान मीडिया में आया कि लड़की की मौत
पोस्टमाॅर्टम जो कि 8 बजे रात में हुआ उसके 18 घंटे पहले हो चुकी थी।

4- जांच दल को तथ्यों से अवगत करा रहे कोतवाल रघुबीर सिंह और मजिस्ट्रेट
अजय कुमार सिंह से मीडिया में आई खबर कि लड़की के पिता ने लिखकर दिया है
कि उसने आत्महत्या की है के बारे में कोई भी जानकारी न होना बताना। वहीं
जांचदल ने अन्य महिला अधिकार संगठनों के जांच दल से इस संबन्ध में बात की
तो उन्होंने बताया कि पुलिस ने उनसे कहा कि लड़की के पिता ने ऐसा लिखा है
जिसकी वजह से एफआईआर नहीं की गई वहीं जब उन लोगों ने मृतका के पिता
द्वारा दिए गए पत्र को मांगा तो पुलिस ने काफी देर बाद मृतका की हत्या के
बाद हुए प्रर्दशन के बाद दर्ज किए गए मुकदमें की काॅपी उन्हें दिखाई।
जिसपर सवाल करने पर पुलिस टाल-मटोल करने लगी और अपराध का क्राइम नंबर तक
नहीं बताया। यह स्थितियां इस बात का संकेत दे रही हैं कि पुलिस अपनी
कहानी के मुताबिक विवेचना और मजिस्टेरियल जांच करवाना चाहती है जिससे
तथ्यों को वह अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ सके।

पुलिस की गोलीबारी में नदीम की मृत्यु व प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज,
गोलीबारी, घरों पर छापेमारी व फर्जी मुकदमें लादने के संदर्भ में-

मृतका का शव कोतवाली के टाॅयलेट में मिलने के बाद लड़की के पिता द्वारा
यह कहने कि मृतका के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी पुलिस वालों ने हत्या
कर दी के बाद महमूदाबाद कस्बे की इंसाफ पसंद अवाम कोतवाली पर आकर यह मांग
करने लगी कि दोषी पुलिस वालों पर मुकदमा दर्ज किया जाए। इस दौरान वहां
आईजी ज़की अहमद, पुलिस अधीक्षक राजेश किशन समेत शासन-प्रशासन के आला
अधिकारी मौजूद थे। पर मजबूत तथ्यों के बावजूद पुलिस के खिलाफ एफआईआर न
दर्ज कर आला अधिकारियों के इशारे पर अपने मांगों के लिए संघर्षरत आम-अवाम
पर लाठी चार्ज कर व गोलीबार कर इंसाफ की अवाज को हर स्तर पर कत्ल करने की
कोशिश की गई। इन्हीं सिपाहियों की गोलीबारी में नदीम को भी गोली लगी
जिसके बाद जब उसके साथियों ने उसे उठाकर वहां से अस्पताल ले जाने की
कोशिश की तो न सिर्फ उन पर लाठी चार्ज की गई बल्कि घायल नदीम को वहां
छोड़ जाने के लिए मजबूर करने के लिए फायर किए गए। जब उसके साथी वहां से
हट गए तो जहां सिपाहियों को उसे अस्पताल ले जाना चाहिए था वहां उल्टे
उन्होंने गोली लगने से तड़प रहे नदीम को लाठियों से तब तक पीटा जब तक कि
वह मर नहीं गया। जांच दल को लोगों ने बताया कि सिपाहियों ने ऐसा इसलिए
किया कि अगर नदीम बच जाता तो वह उनके खिलाफ गवाह हो सकता था।

कोतवाली में जिन लोगों ने प्रमुखता से मृतका की मौत पर पुलिस के खिलाफ
एफआईआर दर्ज करने की मांग की उनकी पुलिस ने फर्जी मुकदमें में गिरफ्तारी
कर ऐसी इंसाफ पसंद आवाजों को दबाने की कोशिश की जो महमूदाबाद कोतवाली
पुलिस के आपराधिक चरित्र के खिलाफ थी। तो वहीं पूरे कस्बे के नागरिकों को
आतंकित करने व आवाज न उठाने देने के लिए 11 अगस्त से लेकर जब तक जांच दल
महमूदाबाद 14 अगस्त को गया था, उस दिन तक पुलिस की छापेमारी का दौर चल
रहा था।

जांच दल ने इस बात को बहुत पास से देखा कि इंसाफ का कत्ल करने पर उतारू
पुलिस उन पुलिस वालों जिनकी जीनत की हत्या में संलिप्तता है को बचाने के
लिए आला अधिकारियों की सरपरस्ती में पूरे इलाके की इंसाफ पसंद अवाम पर
कहर ढा रहे हैं।

निष्कर्ष
कोतवाली के टाॅयलेट में मिले जीनत के शव और उसके द्वारा 6 बजे से 6 बजकर
20 मिनट के बीच आत्महत्या करने के पुलिस के तथ्य को पोस्टमार्टम रिपोर्ट
के हवाले से आए सीएमओ सीतापुर के बयान कि पोस्टमार्टम जो कि 8 बजे रात से
शुरू हुआ था के 18 घंटे पहले उसकी मौत हो चुकी थी खारिज कर देता है। तो
वहीं जब पुलिस खुद कह रही है कि मृतका 5 बजकर 55 मिनट पर कोतवाली पहंुच
गई थी तो 6 बजे मृतका के पिता द्वारा अपनी लड़की के बारे में कोतवाली में
पूछने पर उसे कुछ न बताना और 6 बजकर 20 मिनट पर जब पुलिस ने लड़की की
टाॅयलेट में मौत हो जाने की पुष्टि की उस वक्त भी मृतका के पिता जो फिर
वहां आए और उसके बाद 7 बजे जब वह फिर आए फिर भी उसे मृतका जो कि उसकी
लड़की थी के बारे में न बताना पुष्ट करता है कि पुलिस तथ्यों को मृतका के
पिता से छुपा रही थी। तो वहीं पोस्टमार्टम के हवाले से मृतका की मौत जब
लगभग दो से तीन बजे के बीच हो चुकी थी तो पुलिस की कहानी के पात्र चीनी
मिल कर्मचारी अमर सिंह, वन विभाग चैकीदार यासीन, पुलिस सिपाही ब्रहृमदेव
चैधरी, होमगार्ड रामइकबाल और कोतवाली में मौजूद चैकीदार शिवबालक और अपने
को टाॅयलेट में मृतका द्वारा फांसी लगाए जाने के बाद उसे देखने वाले
प्रत्यक्षदर्शी कोतवाल रघुबीर सिंह समेत अन्य पुलिस वालों की कहानी पर
सवाल उठ जाता है कि आखिर क्यों रात दो-तीन बजे के बीच हुई मौत को वे सब
सुबह 6 बजे के तकरीबन बता रहे हैं या फिर उसकी कहानी बना रहे हैं। वहीं
जांच टीम को मालूम चली कही सुनी बातें कि लड़की रात दो-ढाई बजे के करीब
थाने के गेट से बाहर नग्न अवस्था में भागने की कोशिश कर रही थी जिसको
चार-पांच पुलिस वाले पकड़कर कोतवाली के अंदर ले गए की पुष्टि पोस्टमार्टम
रिपोर्ट से मृतका की मौत का समय और उस टाॅयलेट में मृतका द्वारा लगाई गई
फांसी की पुलिस की झूठी कहानी जिसमें फांसी लगाना कहीं से भी मुमकिन नहीं
हो सकता जहां पुलिस की पूरी कहानी पर सवाल उठाता है वहीं इस बात पर भी
सवाल उठाता है कि रात में हुई मौत को आखिर पुलिस क्यों सुबह हुई मौत बता
रही है। जबकि परिस्थितिजन्य साक्ष्य जीनत के साथ हुए बलात्कार और हत्या
की ओर इंगित करते हैं। ऐसे में कोतवाली की पुलिस इस घटना में संलिप्त है
वहीं इस घटना के इतने दिनों बाद भी जिला व प्रदेश स्तर पर शासन व प्रशासन
स्तर पर पुलिस की कहानी को ही जबरन सच साबित करने की कोशिश हो रही हो तो
राज्य की किसी भी एजेंसी द्वारा इस घटना की निष्पक्ष जांच नहीं हो सकती।
निष्पक्ष विवेचना न्याय का आधार होती है जिसको पाने का हक हर पीडि़त व
इंसाफ मांगने वाले का हक है। उसी अधिकार के तहत हम मांग करते हैं कि इस
घटना की सीबीआई जांच कराई जाए।

जांच दल के सदस्य
मुहम्मद शुऐब , मसीहुद्दीन संजरी, शाहनवाज आलम, राजीव यादव, हरेराम
मिश्र, जियाउद्दीन, अनिल यादव