जुल्म के खिलाफ मारुती मजदूरों के अनथके संघर्ष के समर्थन में और एक बार हाथ बढ़ाइये

November 19, 2015

श्रमिक संग्राम कमेटी ( S.S.C.)

जुल्म के खिलाफ मारुती मजदूरों के अनथके संघर्ष के समर्थन में और एक बार हाथ बढ़ाइये
बर्तमान में धार्मिक असहिष्णुता लेकर वाद-विवाद समाचार की सुर्खियों में हैं । पिछले कई सालों से देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्र में लगातार एक दुसरे प्रकार के उत्पीड़न व दमन घटित हो रहें हैं। लेकिन इसके बारे में समाज के जाने माने लोग, साहित्यकार, फिल्म निर्माता, अभिनेता, राजनेता, आदि बिल्कुल चुप्पी साधे हुए हैं। बारंबार ये दिखाई दे रहा है कि सरकार व राजसत्ता, लगातार हमलावर तेवर अपनाते हुए तमाम उत्पीड़क शक्तियोंको इस्तेमाल कर संघर्षरत मजदूर किसान यहाँ तक कि छात्रों पर भी टूट पड़ रहे हैं। वर्तमान समय में ऐसा ही मारुती कंपनी के 34 मजदूर तीन बर्ष से ज्यादा समय से जेल में बंद हैं। कुछ ही माह पहले तक 147 मारुती मजदूर विचाराधीन स्थिति में जेल में सन 2012 से बंद था। कुछ दिन बाद ही शायद उन्हे सजा दिया जाएगा। सरकार राजसत्ता व पूँजीपति बार-बार इस तरह ये साबित कर रहे हैं कि वे बेहिचक बेरहमी के साथ मजदूर किसान मेहनतकश लोगों का प्रतिवाद आंदोलन कुचलने के किए आमादा हैं। अब जेल में कैद मारुती मजदूरों को और भी सख्त सज़ा देकर उसी को फिर से साबित करने के लिए वे आगे बढ़ रहे हैं।

सन 2011 के शुरुआत से मारुती के मजदूर संघर्ष कर रह हैं । अपने ही बल बुते पर। तीन–तीन बार हड़ताल, मैनेजमेन्ट, सरकारी श्रम दफ्तर एंव पुलिस के दमन, उत्पीड़न के बीच 2012 में अपने आंदोलन की ताकत पर मारुती मजदूर, अपने यूनियन का रजिस्ट्रेशन कराने में सफल तो हुए। लेकिन उसके बाद ही खुले आम सरकारी मदद से नया गठित यूनियन की कमेटी व मजदूरों पर मारुती मैनेजमेन्ट का दमन शुरु हो गया। ऐसा लगातार दमन उत्पीड़न की परिस्थिति के कारण मजदूरों में गुस्सा व क्षोभ बढ़ते जा रहे थे। 18 जुलाई 2012 के दिन एक दलित मजदूर को गाली गलौज देने की घटना को लेकर विवाद एक विस्फोटक स्थिति पैदा कर दिया। इसमें मारुती मैनेजमेन्ट ने यूनियन के खिलाफ साजिश करके ऐसा स्थिति बना दी। इसी मौके का फायदा उठाकर पूँजीपति मालिक व सरकार, मजदूरों पर टूट पड़ा। पिछले समय से चलते आ रहे मजदूरों के दमन के घटनाक्रम कों आड़ मे रखकर पूँजीपति एवं सरकार, कोर्ट-पुलिस सभी ने 18 जुलाई का घटना की सारी जिम्मेदारी मजदूरों के सिर पर मंढ़ दी। वे अपने मनमाने तरीके से मजदूरों को धर दबोचा और 147 मजदूरों को जेल मे डाल दिया। वे वर्तमान में, मजदूरों को ‘हत्यारा’ साबित करने के लिए तमाम हथकंडे अपना रहें हैँ। 18 जुलाई 2012 की घटना के बाद मजदूरों पर लगातार किए गए दमन के खिलाफ हजारों छंटनी हुए मारुती मजदूर, उनके समर्थन में खड़े हुए विभिन्न कारखानों व औद्योगिक क्षेत्रों के मजदूरों ने 2012 से लगातार धरना, अनशन, जुलूस, देश के विभिन्न प्रांत में एक साथ प्रदर्शन के जरिये असली घटना का खुलासा कर दमन रोकने तथा न्याय की मांग की। लेकिन सरकार तथा राजसत्ता के कान में जूँ तक नहीं रेंगा। बल्कि मजदूरों की आवाज दबाकर, धर पकड़ किया, प्रदर्शनों पर प्रतिबन्ध लगाकर एक जनविरोधी तनाव पूर्ण स्थिति पैदा करने के कोई कसर नहीं छोड़ा। यह सब कुछ इन लोगों ने किया पूँजीपतियों का हित रक्षा के लिए। हाईकोर्ट ने एक मौका में कहा है कि मजदूरों को जमानत देने से विदेशी पूंजीपति नाराज होंगे, पूंजी विनिवेश की स्थिति पर गलत असर पड़ेगा। हाल ही में मारुती फैक्टरी के गेट के सामने कन्ट्रैक्ट मजदूरों द्वारा धरना दिये जाने के दौरान कंपनी के बाउंसरों व पुलिस उठा ले गई और मार-पिटाई के साथ ये धमकी दी कि ज्यादा नेतागीरी की तो देशद्रोह की धारा लगा दुंगा। अब आने वाले माह में उन्होंने बंद किए गए मजदूरों पर बड़ी से बड़ी सजा देने की तैयारी कर रहें है। अगर आज इस तरह की घटना बिना किसी प्रतिवाद या विरोध के पूँजीपति व उनके सेवक सरकार कर सकते हैं तो क्या कल चारो ओर मजदूर किसानों पर दमन और बेलगाम नहीं होगा ?

मजदूरों ने जानते हैं कि ऐसी एक तरह के तीब्र दमन और अन्याय सिर्फ मारुती फैक्टरी में नहीं तमाम कारखानों में मजदूरों के साथ हो रहा हैं । वैश्विकरण-उदारीकरण के नाम से पूंजीपतियों के स्वार्थ में सरकार पिछला 20-25 वर्ष से जो बर्बर हिंसक हमले चला रहे है, उसीका नतीजा भुगत रहे हैं मजदूर। देशी-विदेशी पूंजीपतिओं का और भी मुनाफे के लिए मजदूरों का अधिकार, सुविधाओं को हड़पा जा रहे है। इस हमले में मदद दे रहे है तमाम प्रतिष्ठित पार्टियां। मजदूरों ने बखुबी इन पार्टियों के बेईमानी को समझ रहे है । इसी कारण मारुती हो या अन्य कारखानें पर हो मजदूरों ने स्वतंत्र रूप से संघर्ष चलाते की कोशिश में जुटे है। मारुती के मजदूर भी स्वतंत्र रूप से संघर्ष का निमार्ण किया था। विशेषकर इसलिए पूंजीपती-सरकार और तमाम रंग-बिरंगी पार्टियों को डर है कि शोषण-दमन बढ़ने के साथ-साथ आंदोलन के जरिए मजदूरों की स्वतंत्र शक्ति और भी उभरने लगेगी। इसके कई संकेत विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में मिल भी रहा है। इसलिए मारुती जैसे मजदूर आंदोलन को हर तरह का दमन इस्तेमाल करके बेरहमी के साथ सफाया करने के लिए वे आमादा है। इसलिए पूंजीपती, सरकार व राजसत्ता मजदूरों को घिनौने हत्यारे, साबित करने के लिए इतना आक्रामक हो गई है।

एक मजदूर होने के नाते ये सुनने के बाद आप क्या करेगें ? निराशा में चुप्पी साधे रहेंगे ? या ये सोचेंगे कि मजदूरों पर ये क्रुर दमन शोषन, उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलन्द करना हैं । आंदोलन करने के अपराध में पूंजीपती मालिक के रोष का शिकार, मारुती के 36 बंद मजदूरों , 100 से ज्यादा ओरोपी मजदूरों एंव 546 छंटनी किए गए मजदूरों के पक्ष में खड़े होना क्या आपका फर्ज नही बनता है ?

मारुति में जो घटना हुआ है और भी अनगिनत फैक्ट्रियों में एक ही किस्म की घटना को दोहराया जा रहा है। एक ही किस्म के दमन से पीड़ित मजदूरों के यातना की आवाज गुंज रही है। जैसै गाजियाबाद की एलाईड –निप्पो, नोयडा की ग्राजोयानो, कोइमबटुर की प्रिकोल, यानाम की सिरामिक्स फैक्ट्ररी, जूटमिल , चाय बागान हर क्षेत्र में । एक ओर काफी अड़चन का सामना करते हुए भी एक-एक फैक्ट्री में उभर रहे है मजदूर आन्दोलन। और उसके विपक्ष में एकजूट हुए निर्मम मुनाफापिपासु पूँजीपति बर्ग एंव उनको हितैषी सरकार व प्रतिष्ठित पार्टियों का गठबंधन। ऐसे संघर्षो में विशेष उल्लेखनीय है मारुती मजदूरों का अपनी स्वतंत्र संगठित अनथके प्रयास। ऐसे संघर्षो की रक्षा के लिए जरुर हम सभी मजदूरों को खड़ा होना होगा। मांग रखना होगा कि सभी मजदूरों को विना किसी शर्त के रिहा किया जाए, छंटनी किए गए मजदूरों को नौकरी में बहाल किया जाए। हालांकि साथ ये भी ध्यान रखना जरुरी है कि तीब्र ताकतवर, विरोधी पक्ष के खिलाफ उचित जवाब सिर्फ तमाम मजदूरों की एकताबद्ध आन्दोलन ही दे सकती है। और ये जरुरी है सिर्फ मारुति मजदूरों पर हो रहे अन्याय का हिसाब चुकता करने के लिए नहीं। देश की तमाम मजदूरों पर ही रहे अन्याय का सही प्रतिरोध के लिए । एकता बनाने की काम मजदूर आन्दोलनों से उभर रही अगली कतार के मजदूर ही सबसे बेहतर तरीके से कर सकते है। आज से ये तैयारी न लेने पर हर मारुती जैसा आन्दोलन अलग थलग रहकर ही खत्म हो जाएगा। आइये, अलग-अलग रहकर एक-एक मारुती प्रीकोल, जूटमिल, चाय वागान की लड़ाई, जुझारु मजदूरों का पूंजीपतियों के साजिश के जाल में फँसकर खत्म हो जाने की बजाय सभी मजदूर एकजुट हो कर इस तीव्र हमले के खिलाफ प्रतिरोध में शामिल हो जाए। आज की एक-एक कारखाना स्तर की मजदूरो की स्वतंत्र संघर्षो को जिन्दा रखने के साथ-साथ तमाम प्रान्तों के जुझारु मजदूरों के बीच एक नया एकता, नया संगठन बनाने के लिए प्रयास किया जाए। ये आवाज उठाया जाए कि, पूंजीपति ये समझ लेना कि मारुती के सघर्षरत मजदूर अकेले नही हैं। हम सब शामिल हैं और जल्द हमसब एकजूट होंगे। विभिन्न प्रांन्तों के तमाम मजदूरों की एकताबद्ध ताकत के बल पर पुंजीपति वर्ग के खिलाफ आगे बढ़ेंगे। मजदूर बर्ग की सामुहिक स्वार्थ में।