मुजफ्फरनगर: प्रेस विज्ञप्ति, CPI (ML)- New Democracy

March 12, 2016

विष्णु सहाय आयोग ने मुजफ्फरनगर मुस्लिम विरोधी दंगों से संबंधित इतने सारे प्रत्यक्ष तथ्यों को नजरंदाज कर दिया है कि आम आदमी भी उनकी रपट के प्रेरित उद्देश्यों को समझ रहा है। रिपोर्ट ने न्याय व कानूनी जांच को एक बुरा नाम दिया है और पक्षपाती निष्कर्ष प्रस्तुत किए ह®। इस रपट ने देश की न्याय प्रणाली व्यवस्था पर आम लोगों के विश्वास पर धक्का पहुँुचाया है।
विशेष तौर पर सहाय आयोग:
1. आरएसएस नेतृत्व में भाजपा जाट नेताओं, जिनके नाम दंगे कराने व नेतृत्व देने में खुल कर आए थे – भाजपा बिजनौर सदर विधायक भारतेन्दु सिंह, स्वामी ओमवेश, भाजपा विधायक संगीत सोम, संजीव बलियान, सुरेश राणा, भाजपा के हुकुम सिंह, नरेश व राकेश टिकैत को मुक्त कर दिया है।
2. उन प्रशासनिक अफसरों को जिन्होंने नांग्ला-मंदौर गांव में 7 सितम्बर को महापंचायत व कई साम्प्रदायिक गोलबंदियां व खाप पंचायतें जगह-जगह अगस्त से अक्टूबर 2012 के बीच होने दीं, हालांकि हरेक के बाद मुसलमानों पर हमले हुए, को छोड़ दिया; जिला प्रशासन द्वारा कवाल गांव के ‘लड़की छेड़ने’ की घटना के बाद हुई हत्याओं पर मुस्तैदी से कार्रवाई करने और लगातार साम्प्रदायिक गोलबंदियां होने देने तथा बाद में काकड़ा गांव से व्यापक पलायन के दोष से मुक्त कर दिया है।
3. उन पुलिस अफसरों व थानेदारों को, जहां सूचना के बावजूद उन्होंने मुसलमानों पर हमले व सम्पत्ति नष्ट करने की शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की, 540 दर्ज एफआईआरों के दोषियों को मुक्त घूमने देने व न पकड़ने, दोषियों का नाम हटाने के लिए ‘खुल रेट’ पर रिश्वत लेने और शिकायतकर्ताओं पर दबाव बनाकर शिकायतें वापस कराने के दोष से मुक्त कर दिया है।
4. वरिष्ठ पुलिस अफसरों एडीजीपी क्राइम व डीजीपी, जो दंगे रोकने के लिए नांगला-मंदौर में कैम्प कर रहे थे और जिनके रहते 8 व 9 सितम्बर की घटनाएं घटीं, को दोषमुक्त कर दिया है।
5. सपा सरकार के राजनैतिक नेतृत्व को इसने तीन महीने तक साम्प्रदायिक आग जलने दी और अफसरों को तब तक सख्त निर्देष नहीं दिए जब तक मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत में गांव-गांव दंगे नहीं भड़क उठे।
6. सपा प्रशासन का बिचौलियों, देवबंद के जमायते-उलेमा-ए-हिन्द व कुछ एनजीओ के साथ षडयंत्रा करने से दोष मुक्त कर दिया जिसमें उन्होंने हर पीड़ित परिवार को 5 लाख रुपए का मुआवजा देने व इसके एवज में उनसे ‘किसी भी हाल में अपने गांव वापस न जाने’, उस पैसे का प्रयोग ‘अन्यत्रा स्थान पर’ पुनर्वास के लिए प्रयोग करने और अपने गांव में ‘सम्पत्ति के नुकसान का मुआवजा न मांगने’ का हलफनामा साइन कराने का ठेका दिया था।
7. सपा सरकार द्वारा 51,000 पीड़ितों को बिना छत व खाने के 11 पुनर्वास कैम्पों में कड़ाके की ठंड में रखने और बाद में बुल्डोजर जलवाकर उन्हें जबरदस्ती खाली कराने के प्रयास करने से दोषमुक्त कर दिया।
8. प्रतापगढ़, फैजाबाद, कोसीकलां, बरेली, गाजियाबाद में सपा की वर्तमान सरकार द्वारा मुस्लिम विरोधी दंगे होने देने से दोषमुक्त कर दिया।
9. पश्चिम उत्तर प्रदेश में बेहद गहरे किसानी के संकट जिसमें गन्ने की घटती कीमतें व बढ़ती लागत ने व्यापक जाट किसानों को संकटग्रस्त किया हुआ है और वे साम्प्रदायिक गोलबंदी के शिकार हुए ह®, को नजरंदाज किया।
10. पश्चिम उत्तर प्रदेश की पुलिस फोर्स में जहां, 27 फीसदी मुसलमान ह®, मात्रा 3 फीसदी मुसलमानों का होना जिसके कारण क्षेत्रा के मुसलमानों पर हो रहे हमलों में पुलिस ने साम्प्रदायिक भूमिका निबाही, को नजरंदाज किया।
11. वरिष्ठ भाजपा नेता राजनाथ सिंह द्वारा घटना से 6 माह पहले कुटबा गांव में एक पंचायत में साम्प्रदायिक बयान देना को नजरंदाज किया।
यह बात अच्छी तरह स्थापित है कि कुटबा गांव में सबसे ज्यादा, 8 मुसलमान मारे गए और यह कि वहां मौजूद पीएसी के बावजूद हुआ। पुलिस प्रधान के घर में चाय पीती रही और दंगाई मुसलमानों के घर लूटते रहे। 3 मुसलमान जब शिकायत करने पहँुचे तो उन्हें प्रधान के घर में कैद कर दिया गया।
यह भी दर्ज है कि मुहम्मदपुर रायसिंह गांव में 30 अक्टूबर को पुलिस उपस्थिति में हत्याएं की गईं। हुसैनपुर गांव के 3 मुस्लिम युवाओं को खेतों से अपहरण कर मार दिया गया, जबकि गांव में पुलिस तैनात थी। हुसैनपुर गांव वालों ने एसएचओ भंवराकलां थाना को बार-बार फोन किया पर वे नहीं हिले।
विष्णु सहाय आयोग ने बहुत ही लापरवाही के साथ सारा दोष एक एसपी और एक गोपनीय विभाग के अफसर पर डाल दिया है और वे उन राजनीतिक दलों व प्रशासनिक अफसरों के हाथों खेल रहे ह® जिन्होंने इन दंगों को कराने और शांति भंग करने में मुख्य भूमिका निबाही।
(डा0 आशीष मित्तल)
सचिव