गुजरात में दलित उत्पीड़न और प्रतिरोध

August 24, 2016

Received from Nagrik

तथ्यान्वेषी टीम की रिपोर्ट

(हाल में गुजरात में हुई दलित उत्पीड़न की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। उना तालुका के एक गांव मोटा समढियाला में घटित इस घटना को जानने के लिए एक तथ्यान्वेषी टीम वहां गई। तथ्यान्वेषी टीम में इंकलाबी मजदूर केन्द्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन व परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कार्यकर्ता शामिल थे। तथ्यान्वेषी टीम द्वारा पाड़ित दलितों व उनके गांव के विभिन्न समुदायों के लोगों, गौरक्षक दल के सदस्यों, दलित संगठन के प्रतिनिधियों, हमदर्द वकीलों तथा दलित उत्पीड़न का प्रतिरोध करने वाले कुछ बुद्धिजीवियों से बातचीत पर यह रिपोर्ट आधारित है।)

गुजरात में दलित उत्पीड़न की घटना के तथ्यों को जानने के लिए तथ्यान्वेषी टीम सबसे पहले अहमदाबाद गयी। 3 अगस्त, 2016 की सुबह 9ः30 बजे टीम के सदस्य अहमदाबाद के मेडिकल काॅलेज व सिविल अस्पताल पहुंचे। जहां पीड़ितों का इलाज चल रहा था। मेन गेट पर ही कुछ दलित प्रतिनिधियों से मुलाकात हो गई। टीम के सदस्यों ने गुजरात दलित संगठन के संयोजक जयन्ती मखोदिया, सौराष्ट्र दलित संगठन के को-आॅर्डिनेटर देवेन्द्र तथा मजदूर अधिकार मंच के हितेन्द्र राठौड से अस्पताल में भर्ती पीड़ित दलित की स्थिति की जानकारी ली। ये लोग दलितों का सहयोग कर रहे थे। पीड़ित दलितों के परिवार के कुछ सदस्य भी वहां मौजूद थे। टीम के सदस्यों ने पीड़ित परिवार के सदस्य जीतू तथा नन्न जी भाई से भी इलाज के संदर्भ में जानकारी ली। सबने राय दी कि हम खुद ही अन्दर जाकर देख लें।

अस्पताल में आने-जाने वाले लोगों पर सिक्यूरिटी द्वारा निगरानी की जा रही थी। पीड़ितों को देखने के लिए अलग-अलग संगठनों के वी. आई. पी. लोग भी अस्पताल पहुंच रहे थे। मीडिया कार्ड दिखाने पर हमें गेट से अन्दर जाने दिया गया। वहां मौजूद चिकित्सा अधीक्षक (एम. एस.) की अनुमति से हमारी टीम के एक साथी ही अन्दर वार्ड में गये। पीड़ित लोग आई. सी. यू. वार्ड में अपने-अपने बेड पर पड़े थे। शरीर की चोटें तो ठीक हो रही थीं किन्तु उनके चेहरों से प्रतीत हो रहा था कि वे काफी डरे-सहमे हैं। टीम के साथी उनका हाल पूछकर बाहर आ गये। बाहर आकर हमने दलित प्रतिनिधियों से घटना तथा विरोध प्रदर्शनों के संबंध में लम्बी बातचीत की। इस बातचीत के महत्वपूर्ण अंश रिपोर्ट में दर्ज हैं। उन्हीं से पता चला कि अगले दिन 4 अगस्त को ब.स.पा. प्रमुख मायावती भी वहां पहुंच रही हैं।

तथ्यान्वेषी टीम 3 व 4 अगस्त को अहमदाबाद में ही रही तथा शहर के कुछ महत्वपूर्ण व्यक्तियों (सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, वकील व दलित प्रतिनिधियों) से अलग-अलग मिलकर उक्त घटना के संबंध में बातचीत की। इन लोगों से हुई बातचीत का अंश इस रिपोर्ट में है। 4 अगस्त को मायावती दिन के 12 बजे तक अस्पताल पहुंची। मायावती से मिलने के लिए पीड़ितों के गांव तथा दूसरे गांव के दलित समुदाय के लोग दो बसों में वहां आये हुए थे। ये लोग शाम को जब अपने गांव लौट रहे थे तो तथ्यान्वेषी टीम के साथी भी उन्हीं के साथ बस में बैठकर पीड़ितों के गांव मोटा समढ़ियाला 5 अगस्त की सुबह 6 बजे पहुंचे।

सौराष्ट्र, जो कि गिर के जंगल तथा इनमें विचरने वाले भयंकर शेरों के लिए जाना जाता है, के गिर सोमनाथ जिले में रावल नदी पर मोटा समढियाला गांव बसा है। यह अहमदाबाद से लगभग 400 किलोमीटर दूर है। गांव में 250 परिवार रहते हैं। इनमें केवल 27 दलित परिवार हैं। दलित लोग अपनी जीविका मुख्य रूप से खेत में मजदूरी करके जुटाते हैं। इनमें से कुछ ही परिवार मरे हुए पशुओं की खाल उतारते हैं।
पीड़ितों से उनके घर पर विस्तार से बातचीत हुई। पीड़ितों में एक ही परिवार के तीन लोग हैं। इनमें बालू भाई (उम्र 56 वर्ष), उनका पुत्र वशराम (उम्र 23 वर्ष) व रमेश (उम्र 21 वर्ष) तथा उनके पड़ोसी अशोक (उम्र 17 वर्ष) व बेचर (उम्र 27 वर्ष) शामिल है।

बालू भाई ने तथ्यान्वेषी टीम को बताया कि 11 जुलाई, 2016 की सुबह उनके मोबाइल पर बाजू के गांव बेड़िया से अलग-अलग तीन लोगों ने फोन कर बताया कि उनके पशु मर गये हैं, उन्हें उठा ले जाओ। बालू भाई ने बताया कि उन्होंने अपने दोनों लड़कों तथा गांव के अन्य दो लड़कों को तैयार कर मरे पशुओं को उठाने के लिए भेज दिया। तबियत खराब होने के कारण वे खुद नहीं गये। बालू भाई के दोनों लड़के तथा गांव के दो पड़ोसी लड़के बेड़िया गांव के तीनों घरों से मरे हुए पशुओं को उठाकर गांव के सीवान में लेकर आये जहां वे खाल उतारने का काम करते थे।

उक्त मरे हुए पशुओं में 2 गाय और एक बैल था। एक गाय तथा बैल बीमारी के कारण मरे थे जबकि एक गाय को 10-11 जुलाई की रात शेर ने मार दिया था। वशराम ने बताया कि सुबह लगभग 10:30 बजे जब वे लोग खाल उतार रहे थे उसी समय दो लोग मोटर साईकिल से वहां आये तथा गाली बकते हुए कहा कि तुम लोग गाय मारते हो तथा वीडियो बनाने लगे फिर उन्होंने दूसरे अन्य लोगों को फोन करके बताया कि दलित लड़के गाय मार कर खाल उतार रहे हैं। कुछ समय बाद लगभग 50 से अधिक लोग चार चक्के की गाड़ी तथा मोटर साईकिल से वहां पहुंच गये। उनके हाथों में डंडे थे। दो लोग सफेद पाइप वाला पुलिस का डंडा लिए हुए थे। उन्होंने अपने को ‘‘गौरक्षा’’ दल का सिपाही बताया फिर चारों को बुरी तरह पीटने लगे। किसी तरह इस घटना की जानकारी मिलने पर बालू भाई व उनकी पत्नी भी वहां पहुंचे। उन्होंने बालू भाई पर गौ हत्या करने का आरोप लगाते हुए उन्हें भी पीटा। दलित लड़के व उनके परिजन लगातार बताते रहे कि उन्होंने गायों को नहीं मारा है। ‘‘गौरक्षकों’’ को उन्होंने मरे हुए पशुओं के मालिकों का फोन नम्बर दिया और कहा कि इनसे पूछ कर जान लो। ‘‘गौरक्षकों’’ ने फोन द्वारा मालिक को बुलाया। सभी ने बताया कि उनके पशु मरे हुए थे। एक पशु मालिक, जिनकी गाय को शेर ने मार दिया था, को भी ‘‘गौरक्षकों’’ ने पीटा। उनके पैर में पहले से ही राॅड लगी हुई थी।

बालू भाई ने बताया कि ‘‘गौरक्षक’’ 2 घंटे तक पांच लोगों को डंडों से बुरी तरह पीटते रहे। वे उन्हें रोने भी नहीं दे रहे थे। उनके आतंक से वहां मौजूद दूसरे लोग भी डर गये थे तथा उन्हें बचाने के लिए कोई भी आगे नहीं आया। दो घंटे तक पीटने के बाद वे लोग पांचों लोगों को ‘‘गौरक्षा’’ दल के आॅफिस, जो कि वहां से 22 किलोमीटर दूर उना तालुका में था, लाये। वहां भी उन्होंने प्रचार किया कि पांचों लोगों ने गाय की हत्या की है तथा अन्य दूसरे लोगों को इकट्ठा किया और फिर पीटने लगे। गौहत्या का आरोप लगाते हुए उन्होंने ऊना में अपने आॅफिस पर पांचों लोगों को एक घंटे तक बुरी तरह पीटा। बालू भाई ने बताया, ‘‘हम लोग सुबह बिना खाना खाये ही काम पर चले गये थे तथा इन लोगों ने पीट-पीट कर अधमरा बना दिया। हम सभी जमीन पर गिर गये थे तथा उठने की ताकत नहीं थी। फिर उन लोगों ने हमें जबरदस्ती उठाकर अपनी चार चक्का गाड़ी (कार) के पीछे रस्सी से हाथ बांध दिया तथा थाने में बंद कराने हेतु चल पड़े। गाड़ी आगे चल रही थी हमारे हाथ रस्सी से बंधे थे तथा रस्सियां गाड़ी में बंधी थी। हमारे पीछे ‘‘गौरक्षा’’ दल के गुण्डे थे जो हमें पीटते जा रहे थे। पूरे रास्ते हमें पीटा गया व हमें जिधर से ले जाया जा रहा था वहां देखने वालों की भीड़ लग जाती थी किन्तु हमें बचाने के लिए कोई भी व्यक्ति आगे आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। पूरे ऊना शहर में शोर था किन्तु पुलिस बेखबर थी, जैसे कोई जागा हुआ आदमी सोया हो।’’ बालू भाई ने बताया कि उनके शरीर पर कपड़े नहीं थे। सबके शरीर से खून टपक रहा था। खुद बाबू लाल का सिर बीच से फट गया था तथा उसमें से खून की धारा बह रही थी।

पीड़ितों ने बताया कि लगभग 4:30 बजे उन्हें थाना ले जाया गया। उन पर गौहत्या का आरोप लगाते हुए पुलिस के हवाले करके ‘‘गौरक्षक’’ वहां से चले गये। फिर पुलिस ने भी उन्हें मारा तथा गालियां देते हुए उन्हें हवालात में डाल दिया। वहां मौजूद एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि ऊना थाने की पुलिस पीड़ित दलितों पर एफ.आई. आर. दर्ज करने तैयारी कर रही थी तथा ‘‘गौरक्षक’’ अपने कृत्य को बहादुरी का चोला पहना कर जश्न मना रहे थे तथा उक्त कृत्य को स्वयं अपने द्वारा बनाये वीडियो को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रचारित-प्रसारित कर रहे थे।

दलितों की पिटाई की घटना ऊना तालुका में आग की तरह फैल गयी। इस घटना से पीड़ित परिवार के लोग काफी डरे सहमे थे। वहीं पिटाई का वीडियो देखकर आस-पास के दलित समाज के बढ़े हुए लोग भी परेशान थे। आखिर में कुछ लोगों ने थाने जाने की हिम्मत जुटाई उनके पीछे और लोग भी हो गये। लगभग 100-150 लोगों ने शाम 6 बजे थाने पहुंचकर शोर शराबा किया। पीटे गये दलितों की हालत को देखकर लोग गुस्से में थे। लोगों के दबाव में पुलिस ने उन्हें हवालात से बाहर निकाला तथा पहले ऊना के सरकारी अस्पताल में दाखिल कराया। पीड़ितों के अस्पताल पहुंचते-पहुंचते लगभग 500 से अधिक लोग वहां पहुंच गये। पुलिस पर दबाव बढ़ता जा रहा था। लोग ‘‘गौरक्षकों’’ पर मुकदमा दायर कर गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे। आखिर में ऊना थाने की पुलिस ने दबाव में अस्पताल आकर पीड़ितों का बयान लिया तथा ‘‘गौरक्षकों’’ पर मुकदमा दर्ज किया। वीडियो देखकर इस कृत्य में शामिल लोगों की संख्या 38 से अधिक बताया गयी तथा इन्हीं पर मुकदमा दर्ज कर लिया गया। इन पर 307, 323, 324, एस.सी./एस.टी. एक्ट आदि धारायें लगी हैं।

ऊना के सरकारी अस्पताल में पांच दिन तक ईलाज चला। पीड़ितों की गम्भीर हालत को देखते हुए डाक्टरों ने उन्हें राजकोट के जिला अस्पताल को रेफर कर दिया। राजकोट के जिला अस्पताल के डाक्टरों ने 12 दिन ईलाज करने के बाद पीड़ितों की नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें अहमदाबाद के मेडिकल काॅलेज में रेफर कर दिया गया तथा 27 जुलाई, 2016 को मेडिकल काॅलेज में दाखिल किया गया। पीड़ितों को 4 अगस्त, 2016 को मेडिकल काॅलेज से डिस्चार्ज किया गया। इस घटना के संदर्भ में पीड़ितों ने बताया कि उनको मारने-पीटने में शामिल ‘‘गौरक्षकों’’ को वे पहले से नहीं जानते थे। उनमें गांव को कोई व्यक्ति शामिल नहीं था। हालांकि वे इस कृत्य में गांव के सरपंच प्रफुल्ल पटेल के गुप-चुप तरीके से शामिल होने की आशंका व्यक्त कर रहे थे। पीड़ित बालू भाई ने बताया कि ग्राम पंचायत की थोड़ी सी जमीन पर वे लोग गोबर वगैहरा रखते हैं। इस जमीन को सरपंच प्रफुल्ल पटेल ने खाली करने के लिए कई बार कहा है। पीछे लगभग दो महीने पहले प्रफुल्ल पटेल ने धमकाते हुए कहा था कि यदि जमीन खाली नहीं करोगे तो एक दिन मरी हुई गाय जिंदा हो जायेगी। गांव के लोगों ने बताया कि देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग हमारे दुःख को जानने तथा मदद के लिए आ रहे हैं किन्तु गांव के सरपंच प्रफुल्ल पटेल हमें देखने अथवा हाल-चाल जानने तक के लिए भी नहीं आया।

दलित बस्ती में पीड़ित दलितों से उनका पक्ष जानने के बाद तथ्यान्वेषी टीम गांव के दूसरे समुदाय के लोगों से मिलने के लिए गांव में गयी। गांव में नीम के पेड़ के चारों ओर एक बड़ा चबूतरा बना हुआ था जहां 8-10 लोग बैठे हुए थे। उनमें राजपूत, पटेल तथा ब्राह्मण परिवार से जुड़े हुए प्रमुख लोग थे। उन्होंने बताया कि गांव में ऐसी घटना पहली बार घटी है। इस कृत्य में गांव का कोई भी व्यक्ति शामिल नहीं था। मरे हुए पशुओं का खाल उतारने का काम चमार जाति के लोग ही करते हैं और यह उनका पुश्तैनी काम है। एक व्यक्ति ने बताया कि गांव में पीने के पानी के लिए जो एक नलकूप लगा है उसे दलितों के लड़के ही चलाते हैं तथा सवर्ण व दलित दोनों उससे पानी भरते है।। गांव में दलितों व सवर्णों का कोई रगड़ा-झगड़ा नहीं है।

मोटा समढ़ियाला गांव से निकल कर तथ्यावेषी टीम गौरक्षा से जुड़े लोगों की सोच जानने के लिए बाजू के दूसरे गांव मोटा समढियाला से 4 किलोमीटर दूरी पर स्थित नेसड़ा गांव पहुंची। क्षत्रिय बहुल इस गांव में घुसते ही पता चल गया कि यहां पर काफी लोग ‘‘गौरक्षक’’ तथा उनके समर्थक हैं। गांव के अन्दर प्रवेश करते ही परचून की एक दुकान पर 8 लोग बैठे मिले। उनसे बात करने पर पता चला कि वे सभी लोग किसान हैं। टीम ने संवाद करने के लिए पूछा कि आप में से किसी को हिन्दी आती है तो सबने मना कर दिया। टूटी-फूटी हिन्दी में उन्होंने हमारा परिचय पूछा। परिचय जानने पर उन्होंने हमें पानी पिलाया तथा बैठने का कहा। उनमें से एक आदमी सरपंच को बुलाने के लिए चला गया। टीम के लोगों ने मोटा समढियाला गांव के दलितों की पिटाई की घटना पर मीडिया खबरों के बारे में हमें बताया तथा टीम ने उनका पक्ष जानना चाहा। उनमें से एक आदमी ने हमारे सवालों का जवाब देते हुए कहा कि मीडिया तथा सरकार के लोग सही बात नहीं बता रहे हैं। दलित मरी गाय का चमड़ा नहीं उतार रहे थे। वे जिन्दा गाय को मार कर उसके मांस का व्यापार करते हैं। यह सब बात हो ही रही थी कि कुछ नौजवानों के साथ गांव का सरपंच भी आ गया। उनके साथ आये एक लड़के ने हम लोगों का पहचान पत्र (आई. डी.) मांगा, हमारे पहचान पत्र का फोटो अपने मोबाइल से खींचा तथा अपने साथियों को भेज कर व मोबाइल से बात कर अपने नेताओं को हम लोगों के बारे में बताया। लगभग पौने घंटे बाद 4 लोग और आ गये।

उनके आने के बाद विधिवत मीटिंग उस गांव के पंचायत भवन में शुरू हुई। पहले उन लोगों ने तथ्यान्वेषी टीम के बारे में पूछा तथा बाद में अपने बारे में बताया। उन लोगों ने एक कैटालाॅग दिखाते हुए बताया कि वे सनातन चेरिटेबल ट्रस्ट के ‘‘गौरक्षा’’ दल से जुड़े हैं। दो लोगों ने अपना नाम क्रमशः राहुल और डी. के. गोहिल बताया। उन्होंने बताया कि उनका आॅफिस ऊना शहर में है तथा टीम आने की सूचना पर यहां आये हैं। उन्होंने यह भी बताया कि शिव सेना से जुड़ा एक और ‘‘गौरक्षा’’ दल गायों की रक्षा के साथ अन्य सामाजिक काम करता है। मोटा समढियाला के दलितों के बारे में बताया कि वे तीन-चार साल से गौमांस का व्यापार करते हैं व इसके लिए गायों को मारते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘गाय हमारी माता है और हम लोग गौहत्या बर्दाश्त नहीं कर सकते।’’ उनमें से एक ने अपना रोष प्रकट करते हुए बताया, ‘‘चमार चमड़ा उतारने को अपना पुश्तैनी काम बताते हैं, तो हम भी क्षत्रिय हैं और गायों की रक्षा करना हमारा पुश्तैनी काम है। चाहे जो कुछ करना पड़े मंजूर है’’। मोटा समढ़ियाला के दलितों को पीटे जाने के बारे में उन्होंने बताया कि यह घात नहीं प्रतिघात है। राहुल ने पुलिस पर लापरवाही बरतने का आरोप लगाते हुए कहा, ‘‘दलितों को मारनेे से पहले पुलिस को फोन किया गया था किन्तु पुलिस घटना स्थल पर नहीं पहुंची। गुजरात की मीडिया सच्ची बात नहीं छाप रहा है। वे केवल दलितों के उत्पीड़न के बारे में ही लिख रहे हैं। गुजरात में 7 प्रतिशत दलित हैं तथा 8 प्रतिशत मुसलमान हैं, जो कुल 15 प्रतिशत हैं और हमें दबा कर रखना चाहते हैं। हम लोग 85 प्रतिशत हैं। हम किसी भी हालत में गौहत्या को बर्दाश्त नहीं करेंगे’’। इन ‘‘गौरक्षकों’’ के निशाने पर दलित तथा मुस्लिम समुदाय के लोग थे। सी.आई.डी. क्राइम ब्रांच तथा गुजरात पुलिस की आलोचना करते हुए उन्होंने बताया कि मोटा समढियाला गांव के केस में निर्दोष लोगों को पकड़ा जा रहा है तथा उनकी बात नहीं सुनी जा रही। उनसे यह जानने की कोशिश नहीं की जा रही है कि दलितों को क्यों मारा गया। इन लोगों से बातचीत से इस इलाके के सवर्णों के बीच पैठी दलित-मुस्लिम विरोधी मानसिकता का अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। टीम के साथियों ने उनके गांव नसेड़ा के बारे में जानने के लिए कुछ बात की। उन्होंने बताया कि उनके गांव में कोई दलित नहीं है। गांव की कुल आबादी लगभग 800 है। इनमें क्षत्रिय व पिछड़ी जाति के लोग हैं। कुछ घर ब्राह्मण परिवारों के हैं, गांव में कुछ लोग 20 बीघा खेत के मालिक हैं। अधिकतर लोगों के पास इससे कम खेत हैं। इसी गांव के गम्भीर सिंह ने बताया कि गांव में कुल चार ट्रैक्टर हैं। खाद, कीटनाशक दवाइयां तथा पानी महंगा होने के कारण खेती की लागत बढ़ गयी है। कपास का 500 ग्राम का बीज का पैकेट 2500 से 3000 रुपये में मिलता है जबकि कपास बहुत ही कम दाम में बिकता है। खेत से कुछ नहीं मिलता है। उन्होंने बताया कि गांव के आजू-बाजू कोई सरकारी अस्पताल नहीं है। मरीजों को ऊना ले जाकर ईलाज कराते हैं। गांव में आठवीं तक का एक सरकारी स्कूल है। 9वीं से 12वीं तक की पढ़ाई 10 किलोमीटर दूर शमंतेर गांव में होती है। ग्रेजुएशन के लिए नजदीक का शहर ऊना है। गांव के अधिकतर लोग अनपढ़ हैं अथवा कम पढ़े-लिखे लोग हैं। उनमें से एक ने बताया कि गांव में एक भी आदमी सरकारी नौकरी में नहीं है। सभी लोग अपने खेत में काम करके अथवा दूसरों के खेतों में मजदूरी करके अपनी आजीविका चलाते हैं।

तथ्यान्वेषी टीम ने दलित उत्पीड़न से जुड़ी हुई घटनाओं तथा ‘‘गौरक्षक’’ दलों के काम के बारे में जानने के लिए अहमदाबाद में सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों, कुछ वकीलों तथा दलित नेताओं से बातचीत की। गुजरात उच्च न्यायालय के वकील भूषण ओझा ने बताया कि मोटा समढियाला की घटना ने गुजरात सरकार तथा प्रधानमंत्री मोदी के ढोल की पोल खोलकर रख दी है। मोदी शासन काल में मुस्लिम व दलितों पर अत्याचार की घटनायें बढ़ी हैं। उन्होंने बताया कि ‘‘गौरक्षक’’ दलों को आर.एस.एस. के संगठनकर्ता तथा इनके आनुषांगिक संगठनों के कर्ताधर्ता ही चला रहे हैं।

उसी दिन टीम ने एक सेशन कोर्ट के वकील तथा एक मजदूर संगठनकर्ता अंबरीश पटेल से बात की। अंबरीश पटेल ने बताया कि उनका मजदूर संगठन दलितों के साथ है। वे लोग दलित उत्पीड़न के खिलाफ अहमदाबाद में हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए थे। विकास का ढिंढोरा पीटने वाली गुजरात सरकार और प्रधानमंत्री मोदी रोजगार को बढ़ाने में असफल साबित हो रहे हैं। नये रोजगार नहीं मिलने के कारण अधिकतर छोटी जातियां अपने पुश्तैनी कामों को करने के लिए मजबूर हैं तथा बमुश्किल अपनी जीविका जुटा रहे हैं। सामाजिक अपमान झेलने के अलावा इनके पास कोई अन्य रास्ता नहीं है। कृषि की पतली हालत के कारण खेतों के मालिक रहे सवर्णों की हालत खराब हो रही है। वहां भी बेरोजगारी बढ़ रही है जिस कारण सवर्ण नौजवानों का सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ रहा है। आर.एस.एस. और शिव सेना जैसे फासीवादी संगठन ‘‘गौरक्षा’’ के नाम पर गरीब सवर्णों के बेरोजगार नौजवानों को बरगलाकर उन्हें दलितों और मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने में सफल साबित हो रहे हैं। किन्तु इस घटना से आहत पूरे गुजरात के दलितों ने संगठित होकर जिस तरह विरोध प्रदर्शन किया है, वह ऐतिहासिक है।

4 अगस्त को टीम के सदस्य अहमदाबाद के एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा वकील गोविन्द भाई परमार से मिले। गोविन्द भाई ने बताया कि वे ह्यूमन डेवलेपमेन्ट रिसर्च सेन्टर (HDRC) से जुड़े हैं। वे पी.यू.सी.एल. से भी जुड़े हैं। पी.यू.सी.एल. की टीम भी फैक्ट फाइंडिंग के लिए मोटा समढियाला गयी हुई थी। टीम में गोविन्द भाई परमार भी शामिल थे। उन्होंने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि 2012 में सवर्णों ने एक दलित युवक को जिन्दा जला दिया था। दोषी अभी भी जेल में हैं। वे इस केस में दलितों की ओर से पैरवी करने अहमदाबाद से ऊना जाते हैं। उन्होंने बताया कि 22 मई, 2016 को राजुजा तालुका में 7 दलितों को, जो कि मरे हुए पशु कि खाल उतार रहे थे, बुरी तरह 2 घंटे तक पीटा गया। ‘‘गौरक्षक’’ एक कमरे में बंद कर उन्हें आग लगाने जा रहे थे कि तभी पुलिस आ गयी।

टीम 4 अगस्त को ही गुजरात उच्च न्यायालय के वकील रत्ना बेन वोरा से मिली। वोरा जी प्रगतिशील वकील के साथ-साथ एक कर्मठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने बताया कि दलितों पर हो रहे उत्पीड़न को रोकने तथा गैरकानूनी रूप से चल रहे ‘‘गौरक्षक’’ दलों पर प्रतिबंध लगाने के लिए उन्होंने 2 अगस्त, 2016 को एक जनहित याचिका हाईकोर्ट में दाखिल की है। उन्होंने ऊना की घटना के संदर्भ में बताया कि इतिहास में मोदी के गुजरात माॅडल को जाना जायेगा तो विकास के लिए नहीं बल्कि दलितों, मुस्लिमों व महिलाओं पर हो रहे जुल्म, अत्याचार के लिए जाना जायेगा। अपने अनुभव को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उच्च अदालतों में भी दलित वकीलों तथा जजों के साथ भेदभाव किया जाता है।

इसी दिन टीम ने अहमदाबाद के ही एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता व ब्लाॅगर राजू उर्फ राजेश सोलंकी से मुलाकात की। ये दलित हक रक्षक मंच से जुड़े हैं। उन्होंने बताया कि देश में गुजरात माॅडल को जिस तरह प्रोजेक्ट किया जा रहा है, उससे अन्दर ही अन्दर आक्रोश पनप रहा है। गुजरात में मुख्यमंत्री रहे मोदी के काल में अनेक दलित उत्पीड़न की घटनायें घटी हैं। ऐसी ही एक घटना में एक गांव में सवर्ण एक दलित जाति के व्यक्ति को मार पीट कर उसकी बेटी को घर से उठा कर ले गये तथा उसके साथ बलात्कार किया था। गुजरात में दलितों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति खराब होने के साथ गांव में संख्या बल कम है, जिससे उनके ऊपर अत्याचार व शोषण होता रहता है। उन्होंने बताया कि राह चलते दलितों को गांवों में मारा-पीटा जाता है। एक गांव की घटना का जिक्र करते हुए बताया कि वहां एक दलित लड़की के साथ बलात्कार हुआ। पुलिस ने दोषियों पर कोई कार्रवाई ही नहीं की, जिस कारण वहां से 21 परिवार गांव छोड़ कर चले गये। दलितों के विरोध को जायज बताते हुए उन्होंने कहा कि यह तो होना ही था।

तथ्यान्वेषी टीम ने गुजरात के ही कुछ अन्य दलित संगठनों के प्रतिनिधियों से गुजरात में दलितों पर हो रहे अत्याचार के बारे में जानने की कोशिश की। टीम ने गुजरात दलित संगठन के संयोजक जयन्ती मखोदिया तथा सौराष्ट्र दलित संगठन के को-आॅर्डिनेटर देवेन्द्र वानवी से लम्बी बातचीत की। उन्होंने बताया, ‘‘गुजरात में दलितों की समस्यायें बहुत बढ़ी हैं। यहां पर सामाजिक भेदभाव, छुआछूत चरम पर है। गुजरात में दलित सवर्णों और दबंग पटेलों के अत्याचारों के शिकार हैं। दलितों में शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है। गुजरात में 7 प्रतिशत दलित होने के बावजूद नाममात्र के ही दलित सरकारी नौकरियों में हैं। आर.एस.एस. तथा भा.ज.पा. ने लम्बे समय से ही मुस्लिमों के खिलाफ नफरत फैलाकर हिन्दू हितों के नाम पर दलितों व आदिवासियों का ध्रुवीकरण किया है। 2002 में गुजरात में आर.एस.एस. तथा इससे जुड़े हिन्दू संगठनों ने दलितों, आदिवासियों को साथ मिलाकर मुसलमानों का नरसंहार किया था। भय और आतंक फैलाकर वे लम्बे समय से गुजरात पर काबिज हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी ने गुजरात माॅडल को विकास के रूप में प्रचारित किया। लेकिन वहां दलितों, मुसलमानों, छात्रों, नौजवानों, किसानों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। पटेल आंदोलन तथा दलित आंदोलन इसकी बानगी हैं। आर.एस.एस. के लोगों ने इस बार नाराज चल रहे पाटीदार समुदाय का अपनी ओर ध्रुवीकरण करने के लिए एक सोची-समझी चाल के तहत ‘‘गौरक्षकों’’ के माध्यम से दलितों पर हमला बोला है। हालांकि दलितों के जबरदस्त विरोध के कारण यह उल्टा हो गया है’’।

गुजरात औद्योगिक विकास के लिए जाना जाता है किन्तु यहां जो भी औद्योगीकरण हुआ है, वह रोजगार विहीन है। बेरोजगारी की स्थिति गुजरात में देश के अन्य राज्यों से कम नहीं है। बेरोजगार आबादी को साम्प्रदायिक संगठन अपने घृणित उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करते हैं। चूंकि साम्प्रदायिक संगठनों के प्रभाव वाले लोग दबंग जातियों के हैं इसलिए जातीय अहंकार के चलते उनके निशाने पर मुसलमानों के साथ दलित भी होते हैं।

शैक्षणिक रूप से गुजरात का दलित समुदाय बहुत ही पिछड़ा हुआ है। मोटा समढियाला गांव की स्थिति को देखें तो इसकी एक झलक मिलती है। इस गांव के अगल-बगल 10 किमी0 तक कोई माध्यमिक स्कूल नहीं है। स्नातक की पढ़ाई के लिए कम से कम 20 किमी0 दूर जाना होता है। इस गांव का मात्र एक लड़का डिप्लोमा कर रहा है। लड़कियां स्कूल नहीं जातीं, केवल लड़के ही 8वीं तक पढ़े हैं। बाकी सब अपनढ़ हैं। ‘‘सबको शिक्षा, सबको काम’’ तथा ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ अभियान की असलियत को यहां से समझा जा सकता है। स्वच्छ भारत मिशन के विज्ञापन पर करोड़ों रुपये सरकार पानी की तरह बहा रही है लेकिन दलित बस्तियों में शौचालय नहीं है। मोटा समढियाला गांव में दलितों के घरों में एक भी शौचालय नहीं है।

जहां एक ओर दलितों की स्थिति दबी कुचली है तो वहीं दूसरी ओर शासन-प्रशासन-सरकार में सवर्ण हिन्दू मानसिकता के लोग राजकाज चला रहे हैं। अधिकतर दलित उत्पीड़न की घटनाओं में लिप्त लोगों के ऊपर कानूनी कार्रवाई तक नहीं होती है। इस सब के चलते गुजरात में दलितों का भरोसा न्याय व्यवस्था से उठ गया है।

मोटा समढियाला में दलितों की बेरहम पिटाई और अपमान ने पूरे गुजरात में दलितों में सरकार व प्रशासन के खिलाफ क्षोभ और घृणा से भर दिया। दलितों ने आखिर में तय किया कि उत्पीड़न सहकर मरने से अच्छा है, लड़कर मरना और गांव-गांव से दलितों के कारवां सड़कों पर निकल पड़े। स्वतः स्फूर्त ढंग से उठे इस तूफान ने पूरे गुजरात को अपने आगोश में ले लिया। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे।

दलितों ने इस बार विरोध प्रदर्शन का जो तरीका अपनाया वह अपने आप में ऐतिहासिक और नया था। 19 जुलाई, 2016 को सौराष्ट्र के सुरेन्द्र नगर तथा गाडल जिला मुख्यालयों पर बहुत से मरे हुए जानवरों को गाड़ियों से लाकर डाल दिया और चुनौती देते हुए कहा कि गुजरात सरकार, प्रशासन और आर.एस.एस. प्रमुख भागवत आकर मरे हुए पशुओं का दाह संस्कार करें। दलितों के विभिन्न संगठनों ने संयुक्त रूप से 20 जुलाई, को गुजरात बंद की काॅल दी। पूरा गुजरात ठप हो गया था। पूरे गुजरात में तोड़-फोड़ की गयी। ऐसा लग रहा था कि पूरे राज्य में दलितों के सब्र का बांध टूट गया था।

इस विरोध प्रदर्शन के तूफान ने राज्य और केन्द्र सरकार को हिला दिया। राज्य में आनन्दी बेन की कुर्सी तूफान के कारण पलट गयी तथा दलितों के देश में बढ़ते उत्पीड़न पर लम्बे समय से चुप्पी साधे प्रधानमंत्री को अपने ही पाले गुर्गों के खिलाफ मुंह खोलना पड़ा। धंधे बाज ‘‘गौरक्षकों’’ के खिलाफ कार्रवाई से ही तय होगा कि प्रधानमंत्री की कही यह बात कि 80 प्रतिशत ‘‘गौरक्षक’’ रात में गोरखधंधा करते हैं तथा दिन में ‘‘गौरक्षा’’ एक जुमला है या वास्तविकता।

गुजरात में दलित उत्पीड़न के खिलाफ दलितों के अभूतपूर्व प्रतिरोध ने पूरे देश में जाति उत्पीड़न के मुद्दे को केन्द्र में ला दिया है तथा दलित प्रतिरोध को नयी जमीन व नई ताकत प्रदान की है। यह प्रतिरोध आने वाले दिनों में और मजबूती ग्रहण करेगा व जाति उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष को नई ऊंचाइयां देगा। इस बात के संकेत गुजरात के दलित प्रतिरोध ने दे दिये हैं।

साभार:- ‘नागरिक’ पाक्षिक अखबार
http://enagrik.com/news.php?n=1608160901