बडकागांव का ‘गोली कांड’, संसाधनों की लुट के लिए राज्यसत्ता द्वारा सुनियोजित हिंसा

October 1, 2016

 

१ अक्टूबर २०११६ को हजारीबाग के बडकागांव में पिछले १५ दिनों से इस क्षेत्र के किसानों ने एनटीपीसी द्वारा जबरदस्ती कोयला खनन के विरोध में कफ़न सत्याग्रह चला रहे है. प्रशाशन और पुलिस ने सत्याग्रह चला रहे किसानों पर फायरिंग कर ३ किसानों की हत्या एव आठ किसानों को घायल किया है. इसमे से एक किसान गंभीर रूप से घायल है. हमें आशंका है की और लोग इसमे मरे गए है. पुलिस ने लाशों को छुपाने की कोशिश की है. मृत किसानों की संख्या ७ और घायल किसानों की संख्या डॉ दर्जन से अधिक हो सकती है.

 

विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन इस बर्बरता पूर्ण घटना की कड़ी निंदा करता है और इस हिंसक राज्यसत्ता के इन्ह दमन नीतियों का पुरजोर विरोध करता है. और साथ ही मंद करता है की एनटीपीसी द्वारा जबरजस्ती कोयला खनन परियोजना तुरंत रद्द की जाए. गोली कांड के दोषियों पर हत्या का मुक़दमा दर्ज किया जाए. मृत किसानों के परिवारों को तुरंत ५० लाख मुआवजा एव नौकरी दी जाए. घायल किसानों को समुचित इलाज की व्यवस्था की करते हुए मुआवजा दिया जाए.


एनटीपीसी के लिए कोयला खदान खोदने के लिए जमिनाधिग्रहण की प्रक्रिया का स्थानिक किसान और ग्रामसभावासी शुरुवात से ही विरोध करा रहे है. जबरन अधिग्रहण के लिए गयी जमीं पर साल में तिन फसले ली जाती है किसमे पुरे साल भर रोजगार मिलता है. एनटीपीसी को आवंटित १७,००० एकड़ जमीन में से लघबघ २,५०० एकड़ जमीन ये वन भूमि है, जिसमे वन अधिकार कानून के तहद ग्रामसभायों की सहमति लेना आवश्यक हिते हुए भी वो न लिए ही जबरन भूमिअधिग्रहण किया जा रहा था. स्थानिक किसानों के विरोध को नजरंदाज करते हुए उन्हके अधिकारों को कुचलकर मुनाफाखोरी करने का कम सर्कार द्वारा किया जा रहा है. और पुलिसी हिंसा के बलबुतें लोगो पर दमन किया जा रहा है. हम हजारीबाग के बडकागांव में किये जा रहे इस दमन का विरोध करते है.

साथ ही हम सरकार के किसान विरोधी, आदिवासी विरोधी खनन नीतियों का और उन्हासे हो रहे विस्थापन का पुरजोर विरोध करते है. पूंजीवादी-साम्राजवादी हितों की रक्षा के लिए सरकार जल, जंगल, जमीन, प्राकृतिक संसाधन व् राजकीय पूंजी को साम्राजवादी पूंजीपतियो व् भारत के बड़े पूंजीपन्तीयो को सौप रही है. वन सौरक्षण के नाम पर आदिवासी बहुल इलाको से ग्रामीण को जंगल और जमीन से खदेड़ा जा रहा है.

 

 

खनिजों के उत्खनन और जमीन के कब्जे के लिए सरकार और कारपोरेट घरानों के गढजोड़ के द्वारा झारखंड, ओड़िसा, छतीसगढ़ एव अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रो मे सारे कानूनों को ताक पर रखकर जमीनों पर कब्जा करने की कोशिश की जा रही है, किसानों से जबरजस्ती से जमीनों को छिना जा रहा है. तथा छोटा नागपुर काश्तकारी कानून और संथाल परगना काश्तकारी कानून जैसे कानून में बदलाव कर आदिवासियों की जमीन लुट को कानूनन करनेकी कोशिश की जा रही है. इसी प्रयास के तहत इन इलाको मे राजकीय सैनिकीकरण बढ़ाया जा रहा है. विरोध में उतरी जनता के उपर दमन बढ़ रहा है . झारखंड, छतीसगढ़, ओड़िसा और एनी राज्यों में ग्रामीणों को पुलिस द्वारा सीधे तौर पर या फर्जी मुठभेडो में मारा जा रहा है. महिलाओ के साथ यौन हिंसा सुरक्षा बलों की रणनीति का हिस्सा बन गयी है. जिसे तमाम सरकारे आँख मुंद कर समर्थन दे रही ह. इस दमन का विरोध कर रहे वकील , सामाजिक कार्यकर्ता , पत्रकार , शोधकर्ताओ पर भी जुल्म ढहाया जा रहा है , इलाके से खदेड़ा जा रहा है , जेलों में डाला जा रहा है .

विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन, संसाधनों की लुट के लिए जिए जा रहे इन्ह तमाम दमन नीतियों का विरोध करता है.

त्रिदिब घोष,
दामोदर तुरी,
विस्थापन विरोधी जन विकास आन्दोलन
(झारखंड राज्य इकाई)