Bihar – Report on detention and torture of cultural activists in Vaishali

July 20, 2013

[Summary in English – Bhagat Singh Chatra Morcha and Mashal Sanskritik Manch from BHU was holding a cultural programme (to celebrate Premchand jayanti) in Laalganj area of Vaishali, North Bihar, when they were picked up by a battalion of COBRA, CRPF, STF and local police. They were detained, tortured and their belongings were confiscated. The group was released a day later under pressure from the civil society.]

संस्कृतिकर्मियों पर दमन बंद करो !

मशाल सांस्कृतिक मंच एवं भगतसिंह छात्र मोर्चा के द्वारा ( ३१ जुलाई )
प्रेमचंद्र जयंती के उपलक्ष में गीत , नुक्कड़ नाटक और सभा का आयोजन किया
गया | जिसके तहत विभिन्न जगहों पर रिहर्सल किया जा रहा है | उसी कड़ी में
दिनांक १५ जुलाई २०१३ को बिहार ,जिला :वैशाली के लालगंज क्षेत्र में
कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया |

उसके बाद दिनांक १६ जुलाई २०१३ को २ बजे से मजदूर किसान सभा के नेतृत्व
में जिला :पूर्वी चम्पारन ,मोतिहारी प्रखंड के देवाकुलिया चौक पर गीत एवं
नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति कर रहे थे, तभी वहाँ पर सीआरपीएफ. की कोबरा
बटालियन ,एसटीऍफ़ ,एवं स्थानीय पुलिस से भरी चार गाड़ी आ पहुची और चारो तरफ
से हम लोंगों को घेर लिया गया |

हथियारों के साथ पोजीसन ले लिए ,हमारे कार्यक्रम को रोक दिया
गया, गाली-गलौज करने लगे | देवकुलिया चौक को दिन भर के लिए नाकेबंदी कर
दी गयी और सभी गाड़ियों की तलासी ली जाने लगी | हम लोगों से पूछताछ करने
लगे की तुम लोग कौन हो?,यहाँ क्या करने आये हो?,किसने बुलाया है?,क्या
उद्देश्य है?,और कहा की तुम लोग माओवादी हो | हम लोंगों ने बताया की हम
मशाल सांस्कृतिक मंच बीएचयू. से है ,३१ जुलाई प्रेमचंद्र की जयंती के
अवसर पर विभिन्न जगहों पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया है, हम सब
बीएचयू. के छात्र है |आई डी.कार्ड भी दिखाए ,उसके बाद हमारे बैगों की
तलासी ली गयी | कुछ भी बरामद न होने पर हमें फेनहरा थाने ले जाया गया|

जिसमे मजदूर किसान सभा: के सम्राट अशोक ,हरेन्द्र तिवारी ,अवतार
सिंह कुशवाहा ,पत्रकार :संजय कुमार( तलाश पत्रिका ), मशाल सांस्कृतिक
मंच: के जन गायक युद्धेश “बेमिशाल” ,रितेश विद्यार्थी ,संतोष ,नमो
नारायण ,रोहित ,शैलेश कुमार. और महिला विकास मंच: की ममता देवी ,आदि लोग
थे |

थाने में एएसपी :संजय कुमार सिंह के नेतृत्व में थानाध्यक्ष:
देवेन्द्र कुमार पाण्डेय , एसटीऍफ़ ,सीआरपीऍफ़ की कोबरा बटालियन द्वारा
हमसे पूछताछ की : पैसे कहा से मिलते है? ,यहाँ क्या करने आये थे ?,किसने
बुलाया था ? हमारे साथ घंटो पूछताछ ,गाली-गलौज और डंडे लात-घुसे से मारा
-पीटा गया , टार्चर किया गया , तथा कोबरा बटालियन के कमान्डेंट ने
मुर्गा बनाकर कमर पर डंडे से मारा |

वहाँ से रात 8 बजे चार गाड़ी कोबरा बटालियन के साथ मुफस्सिल थाने में
हम लोंगों से सेलफोन, बैग एवं सारे सामानों को जब्त कर लिया गया और फिर
मोतिहारी थाने ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया ,रात में खाना
-पानी तक भी नहीं दिया गया तथा लैट्रीन बाथरूम पर भी पाबन्दी लगा दी गयी
| विभिन जन संगठनो ,पत्रकारों एवं बुद्धिजीवियों आदि द्वारा दबाव बनाए
जाने पर अगले दिन दिनांक : १७ जुलाई २०१३ को ३ बजे जब हमारे ऊपर कोई आरोप
सिद्ध नहीं हुआ तो उन्हें हमें छोड़ना पड़ा |

उत्तरी बिहार के पूरे ईलाके वैशाली ,पूर्वी चम्पारन
,मुजफ्फरपुर ,हाजीपुर को सीआरपीएफ ,पुलिस द्वारा गरीब ,पिछडों को माओवादी
घोषित कर किसी को भी उग्रवादी ,माओवादी कह कर उठा ले जाती है | वहां की
जनता में भय का माहौल है और जनता सीआरपीएफ ,पुलिसिया दमन से त्रस्त है
,वहां पर कोई भी छोटे-बड़े इस तरह के कार्यक्रम भी नहीं करने दिया जाता
है| सीआरपीएफ के सामने पुलिस की कुछ भी नहीं चलती है सब कुछ सीआरपीएफ के
निर्देश पर थाने की मदद से होता है |

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Poster from Revolutionary Cultural Front

कहानियां इस भरोसे को लोगों के बीच बांटने का एक तरीका हैं कि इंसाफ करीब है. और ऐसे एक भरोसे के लिए बच्चे, औरतें, और मर्द एक हैरतअंगेज बहादुरी के साथ लड़ेंगे. इसीलिए तानाशाह किस्से सुनाने से डरते हैं: सारी कहानियां किसी न किसी तरह उनके पतन की कहानियां हैं. -जॉन बर्जर

इंसाफ और मुक्ति की जनता की आवाजों को दबाने की फासीवादी कार्रवाइयों के तहत फासीवादी भारतीय राज्य ने 16 जुलाई को बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) जिले में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के छात्र संगठन भगतसिंह छात्र मोर्चा और मशाल सांस्कृतिक मंच के साथियों को गिरफ्तार किया और उन्हें यातनाएं दीं. रिवॉल्यूशनरी कल्चरल फ्रंट (आरसीएफ) उत्पीड़ित जनता के सांस्कृतिक प्रतिरोध के फासीवादी दमन की कड़े शब्दों में निंदा करता है. इन संगठनों के छात्र-कार्यकर्ता प्रेमचंद जयंती के मौके पर बिहार के दौरे पर थे, जिस दौरान वे जनता के बीच राजनीतिक चेतना और संघर्ष के गीत, नुक्कड़ नाटक और जनसभाएं आयोजित कर रहे थे. मोतिहारी के पहले उन्होंने 15 जुलाई को वैशाली के लालगंज इलाके में अपने कार्यक्रम पेश किए थे. 16 जुलाई को दोपहर 2 बजे वे मोतिहारी प्रखंड के देवाकुलिया चौक पर गीत और नुक्कड़ नाटक की प्रस्तुति कर रहे थे, कि सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, एसटीएफ और स्थानीय पुलिस की चार गाड़ियां आईं और उन्हें घेर लिया. दोनों संगठनों द्वारा जारी किए गए बयान के मुताबिक, हथियारबंद राजकीय बलों ने:

हथियारों के साथ पोजीशन ले ली, हमारे कार्यक्रम को रोक दिया गया, गाली-गलौज करने लगे. देवकुलिया चौक की दिन भर के लिए नाकेबंदी कर दी गयी और सभी गाड़ियों की तलाशी ली जाने लगी. हम लोगों से पूछताछ करने लगे कि तुम लोग कौन हो? यहां क्या करने आए हो? किसने बुलाया है? क्या उद्देश्य है? और कहा कि तुम लोग माओवादी हो. हमलोगों ने बताया कि हम मशाल सांस्कृतिक मंच, बीएचयू से हैं, हमने 31 जुलाई को प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर विभिन्न जगहों पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया है, हम सब बीएचयू के छात्र हैं. आई.डी. कार्ड भी दिखाए, उसके बाद हमारे बैगों की तलाशी ली गई. कुछ भी बरामद न होने पर हमें फेनहरा थाने ले जाया गया.

हथियारबंद बलों ने कम से कम 12 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें इन दोनों संगठनों के लोग भी शामिल थे. उनके बयान के मुताबिक, थाने में पुलिस और सीआरपीएफ ने गिरफ्तार किए गए लोगों को यातनाएं दीं:

थाने में एएसपी संजय कुमार सिंह के नेतृत्व में थानाध्यक्ष देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, एसटीएफ़, सीआरपीएफ़ की कोबरा बटालियन ने हमसे पूछताछ की: पैसे कहां से मिलते हैं? यहां क्या करने आये थे? किसने बुलाया था? हमारे साथ घंटों पूछताछ, गाली-गलौज और डंडे लात-घूंसे से मारा-पीटा गया, टार्चर किया गया, तथा कोबरा बटालियन के कमान्डेंट ने मुर्गा बनाकर कमर पर डंडे से मारा….हमलोगों के सेलफोन, बैग एवं सारे सामान को जब्त कर लिया गया और फिर मोतिहारी थाने ले जाया गया और जेल में बंद कर दिया गया, रात में खाना -पानी तक भी नहीं दिया गया तथा लैट्रिन बाथरूम पर भी पाबन्दी लगा दी गयी.
उत्पीड़ित जनता पर साम्राज्यवादी-ब्राह्मणवादी शासक वर्ग का उत्पीड़न और दमन ज्यों ज्यों तेज हो रहा है, जनता के जनवादी अधिकारों और उसके संसाधनों पर हमले बढ़ रहे हैं, त्यों त्यों जनता का जुझारू संघर्ष भी मजबूत हो रहा. इसकी संगत में जनता प्रतिरोध की क्रांतिकारी सांस्कृति भी विकसित कर रही है. संस्कृति मौजूदा शासक वर्ग द्वारा अपने उत्पीड़न और शोषण को बनाए रखने का एक अहम औजार है और जनता इस औजार को अपनी क्रांतिकारी संस्कृति के जरिए भोथरा कर रही है. इसलिए शासक वर्ग लगातार जनता के संस्कृतिकर्मियों और लेखकों, कवियों, पत्रकारों और कलाकारों पर दमन को तेज कर रहा है. उसका फरमान है कि जो भी कहा, लिखा और गाया जाए, जो भी सृजित किया जाए, वह शासक वर्ग की हिमायत में हो. इस फरमान को नकार देने वालों पर राजकीय जुल्म का सिलसिला चल रहा है. हमने देखा है कि किस तरह सुधीर ढवले, जीतन मरांडी, अरुण फरेरा, कबीर कला मंच के कलाकारों आदि की गिरफ्तारियां हुई हैं और हो रही हैं.

लेकिन जहां जुल्म है, वहां इंसाफ की लड़ाई भी है और उसकी उम्मीदें भी. और जहां उम्मीदें हैं, वहां गीत हैं, कविताएं हैं, नाटक हैं, कहानियां हैं. शासक वर्ग चाहे जितना भी दमन कर ले, चाहे जितनी भी आवाजों को दबाने की कोशिश करे, जनता के संघर्ष बढ़ते रहेंगे और उसकी आवाजें ऊंची और ऊंची होती रहेंगी.