मेक इन इंडिया – किसके लिए? किसके द्वारा?

September 2, 2016

By B.S. Raju. Presented at Nagpur meeting of Visthapan Virodhi Jan Vikas Andolan, 2016.

मोदी का “मेक इन इंडिया”
है
भारत में
कॉरपोरेटों का अपना निर्माण, मालिकाना और लूट

बी.एस.राजू
विस्थापन विरोधी जन विकास आंदोलन
राँची, झारखंड, भारत

कार-मोटरसाइकिल से कृषि उत्पादों तक. हार्डवेयर से सॉफ्टवेयर तक.
उपग्रह से पन्डुब्बी तक. टेलीविजन से टेलीकॉम तक. दवाओं से जैव-तकनीक तक. कागज़ से बिजली कारखानों तक. सड़क से पुल तक. मकानों से स्मार्ट सिटी तक.
दोस्ती से साझेदारी तक. मुनाफ़े से तरक्की तक.
तुम जो भी बनाना चाहो, भारत में बनाओ. यही है “मेक इन इंडिया”.

मुनाफ़े से तरक्की तक: यही “मेक इन इंडिया” का सार है. यही मोजूदा प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक और राष्ट्रीय निवेशकों को किया गया आवाहन है. नव-उदारवादी स्वर्ग में विनिर्माण उद्योग को स्थापित करने के लिए उन्होंने उन्हें आमंत्रित किया है. उन्हीं के लिए उन्होंने “नये भारत” को गढ़ा है.

‘स्वच्छ भारत’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिज़िटल इंडिया’, ‘स्मार्ट इंडिया’ की अपनी महान कल्पनाओं के बारे में भाषण देते हुए वे पूरी दुनिया की सैर करते रहे हैं. भव्यता के साथ आयोजित अपने सभी भाषणों में वे खुद को सांस्कृतिक तौर पर आगे बढ़े हुए पर आर्थिक तौर पर पिछड़े भारत के नए मसीहा, महान मुक्तिदाता के तौर पर पेश कर रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस देश की बुराइयों का ढिंढोरा पीटकर मोदी खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं. तेज़ी के साथ देश को उदारीकरण के रास्ते पर आगे बढ़ाने वाले नये महात्मा के रूप में खुद को सामने ला रहे हैं.

यह ‘मेक इन इंडिया’ किसके लिए है? इंडिया में यह कौन ‘मेक’ करने जा रहा है?

चलिए, पहले हम देश पर शासन कर रही मौजूदा राजग सरकार के कार्यक्रम ‘मेक इन इंडिया’ के तहत बतायी जा रही तमाम आडंबरी योजनाओं पर एक नजर डालें. इस सरकार ने 2014 -2015 के केंद्रीय बजट में औद्योगीकरण और योजनाबद्ध शहरीकरण को प्रोत्साहन देने के लिए पाँच “औद्योगिक कॉरिडोर” परियोजनाएँ यानि औद्योगिक गलियारे विकसित करने की बात की है.

हर कॉरिडोर के पीछे मुख्य आर्थिक चालक-शक्ति होगा: विनिर्माण. और इन परियोजनाओं को इस नजरिये से बड़ा महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि ये भारत के सकल घरेलु उत्पाद में विनिर्माण वाले हिस्से को 2022 तक 15% से बढ़ाकर 25 % तक पहुँचाने वाले हैं.

2014 -2015 के केंद्रीय बजट में इन कॉरिडोरों (गलियारों) में 100 स्मार्ट सिटी विकसित करने का विचार रखा गया है. ये शहर एक ऐसी नयी कार्यशक्ति जुटाने के मकसद से विकसित किये जाने हैं जिससे इन औद्योगिक कॉरिडोरों में विनिर्माण को बढ़ावा मिल सके और देश के शहरों में आवास के लिए हो रही मारामारी कम हो सके.

इसके लिए “राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास प्राधिकरण” (NICDA) की स्थापना की बात चली है जहाँ से सभी औद्योगिक कॉरिडोरों के विकास को संचालित किया जा सके और उनके तार एक-दूसरे से जोड़े जा सकें.

दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर (DMIC – डी.एम.आई.सी.):

डी.एम.आई.सी. परियोजना भारत सरकार और जापान सरकार के बीच करारनामे (एम.ओ.यू.) पर दिसंबर 2006 में हुए हस्ताक्षर के क्रम में शुरू कर दी गई है. 2008 में डी.एम.आई.सी. विकास निगम (डी.एम.आई.सी.डी.सी.) स्थापित हो गया. यही इस कॉरिडोर की परियोजना को लागू करने वाली संस्था है. डी.एम.आई.सी.डी. सी. का रजिस्ट्रेशन एक कपनी के बतौर हुआ है, जिसमें भारत सरकार का हिस्सा 49%, जे.बी.आई.सी. का हिस्सा 26% और बाकी हिस्सा सरकारी वित्तीय संस्थाओं का है. जापान सरकार ने भी डी.एम.आई.सी. परियोजना के लिए वित्तीय मदद की घोषणा की है. पहले चरण में 4.5 अरब अमेरिकी डॉलर और साथ में जापान की अग्रणी तकनीक सहित साझेदारी तय है.

परियोजना का फैलाव उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र तक होगा. यह औद्योगिक कॉरिडोर रेल के पश्चिमी “डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर” (डी.एफ.सी.) के साथ-साथ चलेगा. शुरुआती दौर में डी.एम.आई.सी. के तहत इन छ: राजों के आठ शहरों को विकास के केंद्रों के तौर पर चुना गया है. एक उत्तर प्रदेश के “दादरी-नोएडा-गाजियाबाद निवेश क्षेत्र” को छोड़, बाकी सभी शहरों/विकास-केंद्रों का मास्टर प्लान बन चुका है और सभी राज्य सरकारों की स्वीकृति मिल चुकी है. इन नये औद्योगिक क्षेत्रों के साथ ही साथ “अर्ली बर्ड परियोजनाओं” के विकास के लिए चिह्नित क्षेत्रों के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया विभिन्न राज्यों में अलग-अलग हद तक आगे बढ़ चुकी है और इसे आदर्श पहलकदमी माना जा रहा है. ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.) की समेकित औद्योगिक वसाहत परियोजना, म.प्र. की जल आपूर्ति परियोजना, उज्जैन (म.प्र.) के करीब समेकित औद्योगिक वसाहत विक्रम उद्योगपूरी, नीमराना (राजस्थान) की आदर्श सौर्य ऊर्जा परियोजना और महाराष्ट्र की शेन्द्रा-बिदकिन औद्योगिक पार्क के लिए पाँच एस.पी.वी. गठित हो चुके हैं. डी.एम.आई.सी. ट्रस्ट ने इन एस.पी.वी. के लिए धन की स्वीकृति दे दी है जो राज्य सरकार द्वारा सौंपी जाने वाली जमीन के मूल्य के बराबर होगा.

ग्रेटर नोएडा (उ.प्र.) की समेकित औद्योगिक वसाहत परियोजना, उज्जैन (म.प्र.) के करीब समेकित औद्योगिक वसाहत विक्रम उद्योगपूरी और शेंद्रा-बिदकिन औद्योगिक पार्क नामक जिन ‘अर्ली बर्ड परियोजनाओं’ के लिए क्रमशः उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सरकारें ज़मीन उपलब्ध करा चुकी हैं, उन्हें लागू किया जा रहा है. गुजरात में धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन (धोलेरा एस.आई.आर: विशेष निवेश क्षेत्र) के लिए जहाँ राज्य सरकार ने ज़मीन उपलब्ध कराने का आश्वासन दे दिया है वहाँ भी परियोजना पर अमल शुरू हो चुका है. इन परियोजनाओं में मुख्य संरचनाओं जैसे सड़क, जल-मल निकासी और भूमिगत सुविधाओं को स्थापित करने के लिए इंजीनियरिंग कार्यों, माल की खरीद और निर्माण कार्यों के ई.पी.सी. ठेकेदार की नियुक्ति के लिए टेंडर जारी किये जा चुके हैं. उज्जैन के करीब समेकित औद्योगिक वसाहत विक्रम उद्योगपूरी परियोजना में इन्हीं सब कामों के लिए ई.पी.सी. ठेकेदार नियुक्त भी कर लिया गया है.
केंद्र सरकार का ‘औद्योगिक नीति और प्रोत्साहन विभाग’ परियोजना की प्रगति की लगातार देख-रेख कर रहा है.

बेंगलुरू-मुंबई आर्थिक कॉरिडोर (BMEC – बी.एम.ई.सी.):

सलाहकार ने बी.एम.ई.सी. क्षेत्र की परिप्रेक्ष्य योजना रिपोर्ट का मसविदा तैयार कर लिया है और हाल में संबंधित राज्य सरकारों, डी.आई.पी.पी. (औद्योगिक नीति व प्रोत्साहन विभाग) और इस केंद्र की संचालक संस्था डी.एम.आई.सी.डी.सी. के साथ चर्चा भी कर ली है. इस परिप्रेक्ष्य योजना के अंतर्गत महाराष्ट्र राज्य में चार केंद्रों और कर्नाटक में छ: केंद्रों को चिह्नित कर लिया गया है. प्रत्येक राज्य में वहाँ की राज्य सरकार को मास्टर प्लान के लिए एक-एक केंद्र का चयन करना होगा. कर्नाटक सरकार ने अपने यहाँ ‘धारवाड़’ को बी.एम.ई.सी.के तहत अपने पहले औद्योगिक केंद्र के रूप में चुना है. इस केंद्र की संचालक संस्था डी.एम.आई.सी.डी.सी. ने धारवाड़ केंद्र का मास्टर प्लान बनाने का काम शुरू कर दिया है.

चेन्नई- बेंगलुरू औद्योगिक कॉरिडोर परियोजना (सी.बी.आई.सी.):

सी.बी.आई.सी. में मुख्यतः तीन चिह्नित केंद्र हैं: पोन्नेरी (तामिलनाडु), टुमकुर (कर्नाटक) और कृष्णपट्टनम (आंध्रप्रदेश). तीनों का मास्टर प्लान तैयार हो चुका है. इन केंद्रों के पर्यावरण प्रभाव आकलन का प्राथमिक अध्ययन अभी चल रहा है. राज्य सरकारों को अपने राज्य से दिये जाने वाले सहयोग के करारनामे (स्टेट सपोर्ट एग्रीमेंट: एस.एस.ए.) और शेयर होल्डरों के करारनामे (एस.एच.ए) पर हस्ताक्षरों के लिए आवश्यक कानून पारित करने की तैयारी पूरी करने को कहा गया है.

विशाखापटनम-चेन्नई औद्योगिक कॉरिडोर (वी.सी.आई.सी.):

वी.सी.आई.सी. के सलाहकार एशिया विकास बैंक (ए.डी.बी.) ने वी.सी.आई.सी. की कन्सेपचुअल विकास योजना (सी.डी.पी.) पर अपनी अंतिम रिपोर्ट बनाकर सुपुर्द कर दी है. ए.डी.बी. ने आँध्र प्रदेश के जिन चार केंद्रों विशाखापटनम, काकीनादा, गण्णावरम व कनकीपाडु और श्रीकलाहस्ती-येरपेडु को चिह्नित किया है, उनमें से दो केंद्रों विशाखापटनम और श्रीकलाहस्ती-येरपेडु का मास्टर प्लान बनाने का काम 2015 की तीसरी तिमाही में शुरू हुआ. वी.सी.आई.सी. की क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य योजना अभी तैयार हो रही है. केंद्र सरकार के अर्थिक विभाग ने आँध्र प्रदेश के वी.सी.आई.सी.- सी.डी.पी. को लागू करने के लिए ए.डी.बी. से 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर परियोजना-ऋण के तौर पर और 12.5 करोड़ कार्यक्रम-ऋण के तौर पर लेने की स्वीकृति दे दी है.

अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर (ए.के.आई.सी.):

इस केंद्र की संचालक संस्था डी.एम.आई.सी.डी.सी. को ए.के.आई.सी. की संभाव्यता का अध्ययन करने का काम सौंपा गया है. डी.आई.एम.सी.डी.सी. ने ए.के.आई.सी. की परिप्रेक्ष्य योजना तैयार करने के लिए ‘लिए एसोसिएट्स साउथ एशिया प्राइवेट लिमिटेड” को सलाहकार के बतौर चुना और नियुक्त कर लिया है. इस सलाहकार ने अपनी अंतरिम रिपोर्ट सुपुर्द कर दी है और अब इस पर ए.के.आई.सी. से लाभ पाने व खोने वाले तमाम पक्ष चर्चा कर रहे हैं.

मेक इन इंडिया के तहत तरक्की के लिए चिह्नित क्षेत्र:

1. कार-मोटरसाइकिल
2. कार-मोटरसाइकिल के कलपुर्जे
3. विमानन
4. जैव-तकनीकी (बायोटेकनोलॉजी)
5. रसायन
6. निर्माण-कार्य
7. रक्षा विनिर्माण
8. विद्युत मशीनरी
9. इलेक्ट्रॉनिक संसाधन
10. खाद्य पदार्थों का प्रसंस्करण
11. सूचना तकनीक और बी.पी.एम.
12. चमड़ा
13. मीडिया और मनोरंजन
14. खनन
15. तेल और गैस
16. दवा
17. बंदरगाह और जहाजरानी
18. रेल
19. अक्षय ऊर्जा
20. सड़क और राजमार्ग
21. अंतरिक्ष
22. कपड़ा और वस्त्र
23. तापविद्युत ऊर्जा
24. पर्यटन और आतिथ्यिकी
25. सेहतमंदी (वेलनेस)

स्मार्ट सिटी:

भारत की स्मार्ट सिटी परिकल्पना देश के बड़े महानगरों के बीच औद्योगिक गलियारे तैयार करने की व्यापक योजना का हिस्सा है.

स्मार्ट सिटी वाला भारत 2030 तक दुनिया का सबसे ज़्यादा आवादी वाला देश होने जा रहा है. एक ऐसा देश जो दुनिया भर की विनिर्माण और सेवा क्षेत्र की कंपनियों के लिए सबसे बड़ा बाजार बनेगा और अभी इसमें सबसे कम घुसपैठ हुई है. यह बढ़ती आबादी पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ी से देश के उन्नत नगरों की ओर चली जा रही है. इससे नये-नये मेगा-शहर उभर रहे हैं, जहाँ से अनुमानत: 80% आर्थिक वृद्धि होने जा रही है. यहाँ आधुनिक तकनीक और बुनियादी संरचनाओं (इन्फ़्रास्ट्रक्चर) का इस्तेमाल होने की संभावना है, जिससे देश के लगातार घटते संसाधनों का अधिक प्रयोग होता जाएगा.

एक आकलन के मुताबिक बेहतर आजीविका और बेहतर जीवनशैली की तलाश में प्रति मिनट 25-30 लोग गाँव से शहरों की ओर पलायन करेंगे. गति ऐसी हो, तो 2050 तक 84.3 करोड़ लोग शहरी इलाको में बसे होंगे. इस बड़े पैमाने के शहरीकरण को व्यवस्थित रूप से संचालित करना हो, तो तमाम जटिलताओं से निपटने के लिए, खर्च को कम करने के लिए, कार्य-प्रवीणता को बढ़ाने के लिए और जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए स्मार्ट से स्मार्ट तरीके खोज निकालने ज़रूरी होंगे.

इसी परिप्रेक्ष्य में प्रधान मंत्री मोदी की “डिजिटल इंडिया” की परिकल्पना ने देश भर में सौ स्मार्ट सिटी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना सामने रखी है. मोदी ने अपने एक भाषण में कहा है, “शहर कभी नदी के किनारे बसाये जाते थे. अब वे राजमार्गों के किनारे बसाये जा रहे हैं. पर भविष्य में शहर ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और अगली पीढ़ी की बुनियादी संरचनाओं की उपलब्धता के अनुसार बसाये जाएँगे.”

भारत सरकार ने स्मार्ट सिटी के लिए 2014-15 के बजट में 70.6 अरब रुपये (1.2 अरब अमेरिकी डॉलर) की राशि आवंटित की है. इस विकास योजना की लागत इतनी अधिक होगी कि सार्वजनिक स्तर पर अपलब्ध संसाधन बिल्कुल नाकाफी होंगे और सरकार को अपने कार्यक्रम को गति देने के लिए नये वित्तीय माध्यम विकसित करने की दिशा में काम करना पड़ रहा है.

सरकारी मशीनरी अपनी इस विराट योजना को लागू करने के लिए मानदंड तय करने में लगी है. राज्यों के साथ विचार-विमर्श करते हुए वह उन शहरों को चिह्नित कर रही है जिनका विकास किया जा सकता हो. कुछ स्मार्ट सिटी भारत में पहले ही बनने लगी हैं. उदाहरण हैं कोच्ची समार्ट सिटी, अहमदावाद में गुजरात इंटरनेशनल फाइनान्स टेक-सिटी (जी.आई.एफ.टी.), छत्तीसगढ़ में नया रायपुर, महाराष्ट्र में लवासा और नयी दिल्ली के करीब वेव इन्फ्राटेक की 4,500 एकड़ क्षेत्रफल पर बसी स्मार्ट सिटी.

स्मार्ट सिटी को विकसित करने के लिए भारत विदेशी साझेदारों को भी आमंत्रित कर रहा है. आठ शहरों को बनाने के लिए इस तरह के समझौतों पर हस्ताक्षर हो चुके हैं. तीन जर्मनी के साथ, तीन अमेरिका के साथ और स्पेन-सिंगापूर के साथ एक-एक.

भारत की स्मार्ट सिटी योजना देश के बड़े महानगरों के बीच औद्योगिक कॉरिडोर के निर्माण के वृहद कार्यक्रम का हिस्सा है. इसमें दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर, चेन्नई-बेंगलुरू औद्योगिक कॉरिडोर और बेंगलुरू-मुंबई आर्थिक कॉरिडोर शामिल हैं. इन कॉरिडोरों के अंतर्गत बहुत सारे औद्योगिक और व्यवसायिक केंद्र ‘स्मार्ट सिटी ‘ के रूप में विकसित हो जाने की उम्मीद है. छ: राज्यों को समेटता दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर (डी.एम.आई.सी.) अपने पहले चरण में कॉरिडोर के केंद्र के बतौर सात नये स्मार्ट शहरों का जनक होने जा रहा है.

ग़ौर तलब है कि भारत सरकार उन विदेशी सरकारों के साथ साझेदारी करके अपने इन कॉरिडोरों का विकास कर रही है जो अपने घरेलु निजी उद्यमों के लिए निवेश के नये-नये क्षेत्रों की तलाश करने को आतुर हों. जापान डी.एम.आई.सी परियोजना के पहले चरण के लिए जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी (जे.आई.सी.ए.) से कर्ज के तौर पर 4.5 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश कर स्मार्ट सिटी के विकास में भारत की मदद कर रहा है. जे.आई.सी.ए. ने चेन्नई-बेंगलुरू औद्योगिक कॉरिडोर के अंतर्गत तामिलनाडु के पोन्नेरी, आंध्र प्रदेश के कृष्णपटनम और कर्नाटक के टुमकुर – तीन स्मार्ट सिटियों के लिए मास्टर प्लान तैयार करने की जिम्मेदारी ले ली है. अपनी निजी कंपनियों की मदद से ब्रिटेन बेंगलुरू-मुंबई आर्थिक कॉरिडोर परियोजना को विकसित करने में भारत की मदद कर रहा है.

भारत के स्मार्ट सिटी कार्यक्रम के आठ प्रमुख स्तंभ:

1. स्मार्ट शासन: भारत में स्मार्ट सिटी को बनाने के लिए परिवहन, ऊर्जा और जन सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अगले 20 वर्षों में 1.2 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर के निवेश की आवयश्कता होगी. इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

• 1.2 अरब अमेरिकी डॉलर स्मार्ट सिटी के लिए आवंटित और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के कानूनी मानदंडों में ढील. ‘डिजीटल इंडिया’ के लिए 8.3 करोड़ डॉलर आवंटित.
• 500 शहरों की बुनियादी संरचनाओं को उन्नत करने के लिए सार्जनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र की साझेदारी, अर्थात पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पी.पी.पी.) का प्रयोग.
• स्मार्ट सिटी परियोजनाओं से रोजगार में 10-15 % वृद्धि.
• शहरी विकास मंत्रालय की देश के समूचे 29 राज्यों में से हरेक में दो स्मार्ट सिटी विकसित करने की योजना.
• दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरीडोर विकास निगम लिमिटिड (डी.एम.आई.सी.डी.सी.) की छ: राज्यों में फैले 1500 किमि लंबे औद्योगिक कॉरीडोर में 10,000 अरब अमेरिकी डॉलर के कुल निवेश से सात ‘स्मार्ट सिटी’ की योजना.

2. स्मार्ट ऊर्जा: स्मार्ट ऊर्जा तंत्रों के तीन महत्वपूर्ण आयाम: स्मार्ट ग्रिड

• सभी घरों में बिजली की व्यवस्था; 2017 तक रोज़ कम से कम आठ घंटे बिजली आपूर्ति.
• 2014 तक स्मार्ट ग्रिड टेस्ट बेड और 2015 तक स्मार्ट ग्रिड ज्ञान केंद्र की स्थापना.
• 1 करोड़ अमेरिकी डॉलर के निवेश के बल पर देश में 8 स्मार्ट ग्रिड पायलट परियोजनाओं पर अमल.

ऊर्जा संचय:

• 12 वीं पंच-वर्षीय योजना (2012-17) में 88,000 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन क्षमता.
• 2030 तक देश में कम से कम 250-400 गीगावाट अतिरिक्त बिजली उत्पादन क्षमता आवयश्क.
• भारतीय पावर ग्रिड निगम की अगले पाँच वर्षों में 26 अरब अमेरिकी डॉलर निवेश करने की योजना.
• स्मार्ट मीटर.
• 2021 तक देश में 13 करोड़ मीटर लगेंगे.

3. स्मार्ट पर्यावरण: सतत विकास की गारंटी के तौर पर तीन महत्वपूर्ण आयाम: अक्षय ऊर्जा.

• नवीन व अक्षय ऊर्जा मंत्रालय की 12 वीं पंच-वर्षीय योजना (2012-17) में 30,000 मेगावाट की क्षमता जोड़ने की योजना.
• जल और फालतू जल प्रबंधन.
• जल योजनाओं पर केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की आने वाले वर्षों में 50 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की योजना.
• दिल्ली के लिए 27. 60 करोड़ अमेरिकी डॉलर की अनुमानित लागत पर यमुना एक्शन प्लान के तीसरे चरण को स्वीकृति.
• जल-मल निकासी.
• 67% ग्रमीण आबादी खुले में मल त्याग करती है और दुनिया भर में खुले में होने वाले मल-त्याग का 50 % भारत में होता है.
• भारत सरकार और विश्व बैंक के असम, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में ग्रामीण जल आपूर्ति एवं जल-मल निकासी परियोजना (आर.डब्ल्यू.एस.एस.) के लिए 500 अरब अमेरिकी डॉलर के ऋण के लिए हस्ताक्षर.

4. स्मार्ट परिवहन: भारत सरकार ने बढती आबादी की सुविधा के लिए जन परिवहन प्रणाली को विकसित करने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किये हैं. प्रदूषण-मुक्त परिवहन के तौर पर:

• भारत की सरकार ने 2020 तक 60 लाख बिजली से चलने वाले और हाइब्रिड वाहनों का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है, जिसके लिए 4.13 अरब अमेरिकी डॉलर की योजना की स्वीकृति दे दी है.
• 2027 तक सभी शहरों में और राज्यों के राजमार्गों तथा रा‍ष्ट्रीय राजमार्गों पर बिजली से चलने वाले वाहनों को चार्ज करने के लिए केंद्र स्थापित किये जाने हैं.
• मेट्रो: आने वाले वर्षों में शहरी विकास योजना मंत्रालय मेट्रो रेल परियोजनाओं में 20 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक निवेश करने जा रहा है.
• द्रुतगति रेल: प्रास्तावित 534 किलोमीटर मुबंई-अहमदाबाद द्रुतगति रेल परियोजना में तकरीबन 10.5 अरब अमेरिकी डॉलर निवेश होगा.
• मोनो रेल: मुंबई में बनने वाली भारत की पहली मोनो रेल परियोजना की लागत 50 करोड़ अमेरिकी डॉलर होगी, जिसके पहले चरण में 18.30 करोड़ अमेरिकी डॉलर खर्च हो चुके हैं.

5. स्मार्ट आई.टी. और संचार: सूचना और संचार तकनीक:

• 2016 तक क्लाउड कम्पयूटिंग का भारत में 4.5 अरब अमेरिकी डॉलर का बाज़ार विकसित होगा.
• 17.5 करोड़ लोग 2017 तक ब्रॉड-बैंड कनेक्शन का इस्तेमाल कर पाएँगे.
• सुरक्षा और निगरानी.
• “सुरक्षित शहर” परियोजना के तहत सात बड़े शहरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, अहमदाबाद, बेंगलुरू और हैदराबाद में आपदा प्रबंधन को मनुष्य के हाथ में छोड़ने के बजाय तकनीक को विकसित करने के लिए केंद्रीय मंत्रालय ने 33.3 करोड़ अमेरिकी डॉलर का प्रस्ताव रखा है. तामिलनाडु और पुदुचेरी के तटीय गाँवों में आपदा के खतरों से निपटने के लिए भारत सरकार और विश्व बैंक ने 23.6 करोड अमेरिकी डॉलर के करारनामे पर हस्ताक्षर कर दिये हैं.

6. स्मार्ट बिल्डिंग:

• अनुमान है की प्रति वर्ष 1 करोड़ 15 लाख घरों का निर्माण कर 2020 तक भारत तीसरे सबसे बड़े निर्माण बाज़ार के रूप में उभरेगा.
• इंटेलिजेंट बिल्डिंग मैनेजमेंट सिस्टम्स का वर्तमान में लगभग 62.1 करोड़ का बाज़ार है और अनुमान है कि 2016 तक यह 189.1 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुँच जाएगा.
• स्मार्ट बिल्डिंग से पानी के इस्तेमाल में 30% और ऊर्जा के इस्तेमाल में 40% बचत होगी, जबकि बिल्डिंग प्रबंधन की लागत 10 से 30 % तक कम हो जाएगी.

7. स्मार्ट स्वास्थ्य चिकित्सालय:

• स्वास्थ्य बजट 2014-15 में 27% बढ़कर 5.26 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जिसमें सभी के लिए खर्च उठाने लायक स्वास्थ्य-सेवाओं में सुधार पर विशेष ध्यान रहा.
• देश भर में एम्स जैसी छ: नयी संस्थाओं और 12 सरकारी मेडिकल कॉलेजों की स्थापना.
• 1.2 अरब से अधिक नागरिकों के लिए सुलभ, खर्च उठाने लायक और कारगर स्वास्थ्य-सेवा प्रणाली.

बीमा:

• बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा 26% से बढ़कर 49% कर दी गयी है.
• 2020 तक बीमा उद्योग 1 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना रखता है.

मेडिकल उपकरण:

• भारत का मेडिकल उपकरणों का बाज़ार 2023 तक 11 अरब अमेरिकी डॉलर तक जा पहुँचेगा.
• खुद बखुद खुलने वाले रास्ते से मेडिकल उपकरण क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को अनुमति.
• सेहतमंदी (वेलनेस).
• भारत का सेहतमंदी (वेलनेस) उद्योग 2015 तक लगभग 16.65 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की संभावना है.

8. स्मार्ट शिक्षा:

• 2014-15 के केंद्रीय बजट में भारत सरकार ने 13.95 अरब अमेरिकी डॉलर आवंटित किये हैं जो पिछ्ले वर्ष से 12.3% अधिक है.
• पाँच नये आई.आई.टी और पाँच नये आई.आई.एम. की स्थपना के लिए 7.85 करोड़ अमेरिकी डॉलर का बजट आवंटन किया जा चुका है.
• सेवा क्षेत्र और उद्योग की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय की 1,000 निजी विश्वविद्यालय खुलवाने की योजना है.
• शिक्षा के क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी जा चुकी है.
• 2017 तक भारत के ऑन-लाईन शिक्षा बाज़ार का आकार 40 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है.

वाह, क्या-क्या गुल खिलने वाले हैं!

भारत की जनता को अब किसी चीज़ की क्या ज़रूरत है? ठेठ स्वर्ग को ही लाकर हमारे नाज़ुक हाथों में सौंप दिया जा रहा है! क्या हमारे नाज़ुक हाथ इसका भार उठा पाएँगे? हम ग़रीबों की कमज़ोर आँखें क्या इन विराट योजना-परियोजनाओं की चमक-दमक को बर्दाश्त कर पाएँगी?

यूरोप, अमेरिका, जापान में यह सब पहले से ही रहा है. वहाँ के तामझाम और चमक-दमक की तारीफ़ के पुल बाँधते हुए हम भारतीय लोगों को बड़ा आनंद आता रहा है. पर हम भूल जाते हैं उनके इतिहास को, दो-तिहाई दुनिया के मूल निवासियों के नरसंहार और संसाधनों की लूट को, लाखोलाख ज़िंदगियों की तबाही को, देशज भूमि पर कब्ज़े और उत्पादन के काम आने वाली संपदा के विनाश को.

यहाँ अपने देश में वैसी ही भयानक शोषणकारी संरचना को खड़ा करने के लिए, जो हमारी शांतिपूर्ण व वैविध्यपूर्ण जीवन-शैली को, हमारी भूमि को, नदियों को, समूचे पर्यावरण को ही बर्बाद करने वाली हो, उधार के रूप में निवेश की भीख मांगने के लिए झुक-झुककर अपने घुटने रगड़ने में कोई शर्म महसूस नहीं होती.
हमारे शासकों का कहना है कि चीन के पास भी वही सब तामझाम और चमक-दमक वाली चीज़ें हैं. कि चीन ने यह सब जेट स्पीड से कर लिया. फिर हम क्यों नहीं कर सकते वह सब, उतने ही स्पीड से? चीन जब बहुत कम समय में ही विशाल शहरी और औद्योगिक संरचना खड़ा कर पाया, तो क्यों न हम भारत में भी ऐसा करें? साम्राज्यवादी दुनिया भी हमें चीन के विकास की चकाचौंध दिखाकर उकसाती है कि देखो, तुम चीन से कितने पीछे हो, कहीं के नहीं हो. फिर वह पुचकारती है कि भारत भी तो चीन के साथ बराबरी कर सकता है और उससे आगे भी जा सकता है!

भारत में वही सब करने के लिए साम्राज्यवादी दुनिया भारतीय राज्य और उसकी संस्थाओं पर दबाव डालती है, बाँह मरोड़ती है. कहती है: उदारीकरण करो, अपनी अर्थव्यवस्था को खोलो, और ज़्यादा खोल दो, जिससे हम घुस-घुसकर तुम्हारी भूमि पर कब्ज़ा कर सकें, संसाधनों पर कब्ज़ा कर सकें, बाज़ार पर भी पूरा कब्ज़ा कर सकें.

लंबे समय से विकसित यूरोप, अमेरिका, जापान से लेकर सिंगापुर-थाइलैंड तक के विकास की बातें फैलाकर और मीडिया-तंत्र के सहारे उसी तरह के उपभोक्तावाद का लोभ पैदा कर वे उच्च वर्ग और मध्य वर्ग के शिक्षित अमीरज़ादों के बीच आम सहमति बना चुके हैं.

‘मेक इन इंडिया’ के झंडे-तले उनके सारे घोषित विकास को अगर अंजाम देना हो, तो जानते हैं कितने ज़्यादा धन की ज़रूरत होगी? कितने करोड़ एकड़ भूमि और कितने सारे संसाधनों की ज़रूरत होगी? क्या इसके बाद कोई जंगल बचे रह जाएँगे? इतनी सारी भव्य औद्योगिक वसाहतों और समुद्र तट के गलियारों का निर्माण करते-करते कितने करोड़ लोग विस्थापित हो जाएँगे और अपनी आजीविका के साधन गँवा बैठेंगे? इन परियोजनओं से हमारा पर्यावरण कितना प्रभावित हो जाएगा? क्या इन सब बातों का कोई आँकडेवार अनुमान लगाया गया है? आँखें खोलकर चीन के उन भुतहा नगरों को देखिए जो खाली पड़े हैं, निर्जन, क्योंकि वहाँ जगह-ज़मीन खरीदने के लिए लोगों के पास पैसे नहीं हैं. यूरोप, अमेरिका और दुबई तक के आँकडों को हमें देखना होगा कि वहाँ कितने मकान बनाये गये, कितनी ज़मीनों पर निर्माण कार्य हुआ, और कैसे सब खाली पड़ा है.

औद्योगिक कॉरिडोर और स्मार्ट सिटी की भव्य निर्माण योजनाओं के पीछे दरअसल इसी तरह की बर्बादी लाने वाली विकास संरचनओं को बनाने की मंशा है, जिन परियोजनाओं से साम्राज्यवादी और भारत के बड़े-बड़े व्यवसायी मिलकर मुनाफ़े के रूप में बेशुमार धन बटोरेंगे.

वास्तव में ‘मेक इन इंडिया’ और कुछ नहीं, दुनिया-जहाँ के और हमारे यहाँ के स्थानीय परजीवियों को खुला न्यौता है कि आएँ हिंदुस्तान में “निर्माण कार्य करें, जो निर्मित हो उसका मालिक बने रहें और लूट की कमाई खाते रहें.”

अपने इस न्यौते में भारतीय राज्य साम्राज्यवादी निवेशकों को हमारा सब कुछ देने जा रहा है, जल-जंगल-ज़मीन जहाँ तक चाहें वहाँ तक. और मेहनत करने वाले तमाम लोगों का खून-पसीना सस्ते दाम पर. भारतीय शासक वर्गों का वर्तमान मुखिया नरेंद्र मोदी उन साम्राज्यवादियों को भरोसा दिलाना चाह रहा है कि उनकी बड़ी-बड़ी कंपनियों और भारतीय दलालों की लंबी-चौड़ी योजनाओं और सपनों को साकार करने के लिए वह अपने पूर्ववर्ती सत्तधारियों से कहीं ज़्यादा चुस्ती, फूर्ति और तेज़ी के साथ काम कर रहा है.

आखिर हमारी तथाकथित आज़ादी के 67 साल बाद एकाएक ‘मेक इन इंडिया’ का यह चक्कर क्यों चला है? क्या भारत सदियों से कोई चीज़ बनाता नहीं रहा है? क्या हम अब तक कोई उत्पादन, उपभोग और निर्यात नहीं करते आये हैं? इस देश को अचानक यह क्या हो गया है? पर हमें शायद सवाल यह करना होगा कि देश की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण कायम किये हुए आकाओं को यहाँ की कौनसी चीज़ अब तक सही या उचित नहीं लग रही थी?

क्या हमारे देश में वक़्त की ज़रूरत के अनुसार उत्तम कपड़ा, उत्तम मिट्टी के बर्तन, उत्तम घर-गृहस्थी के सामान और उत्तम आवागमन के साधन बनाये नहीं जाते रहे हैं? घृणा के योग्य हमारे उत्पीड़नकारी, जाति-आधारित सामंती समाज में भी भयानक से भयानक विषमताओं और अमानवीय से अमानवीय शोषण पर आधारित पद्धतियों के बावजूद ‘मेड इन इंडिया’ वस्तुओं की लंबी फ़ेहरिस्त रही है. प्रचुर मात्रा में यहाँ पायी जाने वाली उत्पादित संपत्ति की गुणवत्ता इतनी उन्नत नहीं होती और परिमाण भी इतना अधिक नहीं होता, तो क्या तमाम विदेशी आक्रांताओं की नज़रें हिंदोस्तान की ओर खींची गयी होतीं? इंग्लैंड और ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में जो सबसे बुरी आफ़त आयी, वह आती?

सदियों से हम कुदरत और अपनी सामाजिक संरचना की परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया से उभरी धीमी गति की तकनीक से काम लेते रहे हैं. औद्योगिक क्रांति के दौर तक, जबकि गोरों का आक्रमण और बलपूर्वक दोहन शुरू हुआ और हमारे स्वाभाविक विकास, उन्नति के अपने देशज मार्ग से क्रमश: अगले स्तर तक पहुँचने की प्रक्रिया विकृत कर दी गयी.

हिंदोस्तान ने अब अपनी आज़ादी खो दी और हम इंग्लैंड का उपनिवेश बन गये. तभी से हमने अपना गौरवशाली स्थान खो दिया. सूती कपड़ा उद्योग में हमारा वर्चस्व समाप्त हो गया. कहीं अधिक शोषण पर टिकी औद्योगिक क्रांति की आवश्यकताओं के अनुरूप ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यवस्थित रूप से हमारे देश के जमे-जमाये हथकरघा-आधारित कपड़ा उद्योग के उत्पादन और निर्यात को ठप कर दिया. फिर क्या था! यूरोपी उपनिवेशवादियों और साम्राज्यवादियों ने स्थानीय लोगों के क्रूर नरसंहार करके उनकी भूमि को कब्ज़े में लिया और इस तरह हमारे संसाधनों की अंधाधुंध लूट करते हुए अपने धन, अपनी पूँजी का अंबार खड़ा कर लिया.

पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील, धीमी गति के उत्पादन पर आधारित किसी अर्थव्यवस्था को यूरोप सरीखी अधिक शोषण और तेज़ गति वाली उत्पादन व्यवस्था और अर्थव्यवस्था से प्रतिस्पर्धा करनी पड़े, तो क्या वह टिक पाएगी? नहीं! इसी बात को हम अभी भारत के आदिवासी आबादी वाले क्षेत्रों में होते देख रहे हैं. हम इन्हें पिछड़ा कह दे रहे हैं. पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील आदिवासियों की अर्थव्यवस्था को भिड़ा रहे हैं, कहीं अधिक अत्पादकता वाली, पूँजी-केंद्रित महानगरी अर्थव्यवस्था के साथ जिसमें पग-पग पर शोषण ही शोषण है.

तमाम वस्तुओं के स्वचालित उत्पादन और उत्पादों में अब इन्सान की जगह ले रहे हैं अति-उन्नत तकनीक से चलने वाले रोबो. व्यापार और सेवाओं के डिजीटलीकरण और भूमंडलीकरण से हमारे देश में जीवन के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक, सभी क्षेत्रों में तबाही ही तबाही होने जा रही है. सड़ी-गली धार्मिक और सामंती प्रथाओं के साथ-साथ वाई-फाई जैसी अत्याधुनिक सेवाओं पर आधारित अत्यधिक शोषणकारी अर्थव्यवस्था का घोल मज़दूर वर्ग को वेदना की गहरी खाई में डुबो देने वाला है. चीन की ही तरह हमारे यहाँ का मज़दूर वर्ग भी अब अपने लंबे, पीड़ादायी संघर्षों से अर्जित अपने लाभ को गँवा रहा है. वह साम्राज्यवाद के अधीन आधुनिक ग़ुलाम बन रहा है.

शोषण और नरसंहार से लथपथ यूरोप-अमेरिका के इतिहास को हम कभी भूल नहीं सकते, जहाँ की धन-दौलत और खुशहाली की मीनारें अफ्रीका, एशिया और अपने मूलवासियों की वसाहतों वाले अमेरिका के, यानि दुनिया की दो-तिहाई आबादी की ज़िंदगी की तबाही पर खड़ी की गयी थीं. वही प्रत्यक्ष औपनिवेशिक लूट जो कभी नग्न, बर्बर और बेहद हिंसक तरीकों से हुई थी, अब नये मुखौटे के साथ, नये लिवाज़ में, नयी भाषा, नयी तकनीक, नये युद्ध के हथियारों का प्रयोग कर दो-तिहाई दुनिया और वहाँ की उत्पादन करने वाली मेहनतकश जनता पर अपने प्रभुत्व को कायम रखना चाह रही है. इस लूट के सहारे चल रहे आज के अमीरज़ादों के उच्च जीवन-स्तर और उन्नत जीवन-शैली को कायम रखने के लिए दुनिया भर के आम लोगों को बलि चढ़ाया जा रहा है.

भूमंडलीकरण और डिजिटलीकरण के हथियारों के बल पर आज की ये लुटेरी शक्तियाँ अपना पूँजीवाद का कार्यक्रम परोस रही हैं दो-तिहाई दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं पर नियंत्रण कायम करने के लिए, चाहे वहाँ के देशों में जनता और जीवित पर्यावरण की वास्तविक आवश्यकताएँ कुछ भी हों. तात्पर्य यह कि इस शेष दो-तिहाई दुनिया के अंदर हम भारत के लोगों के पास कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं रह पा रहा है. हमारे पास यह तय करने का अधिकार नहीं है कि हमारी ज़रूरतें क्या हैं और क्या नहीं! मालिक लोग ही सब कुछ तय कर रहे हैं. हमे ग़ुलामों की तरह अपने सिर झुकाये रहने को कहा जा रहा है, चाहे मालिकों का विकास का रास्ता हमें मंजूर हो या न हो. चुपचाप सिर हिलाकर “जी..जी” कहते रहिए!

‘मेक इन इंडिया’ का राजनीतिक अर्थशास्त्र:

‘मेक इन इंडिया’ मूल रूप में अर्थव्यवस्था की उत्पादन संरचना को बदल देने का प्रयास है. खेती से हटकर विनिर्माण की ओर जाने की बात पर बल दिया जा रहा है. लेकिन जिस अहम्‍ सवाल को उठाने की ज़रूरत है वह यह कि हम किस तरह के उद्योग को बढ़ावा देने जा रहे हैं?

निर्यात के लिए माल तैयार करना और इस उत्पादन को बहुराष्ट्रीय कंपनियों से करवाने का एक निश्चित अर्थ होता है. इसी बात पर विचार करने की ज़रूरत है. इस स्थिति में माल की मांग आती है विदेशों से, वहाँ के निर्यात बाज़ार से, हमारे शहरों व महानगरों के मध्यम वर्गीय लोगों से और ग्रामीण वर्ग के धनी-मनी तबकों से. ज़ाहिर है कि देश का अपना बाज़ार बहुत ही तंग है. फोर्ड और होंडा गाड़ियों का उत्पादन हमारे आम खेतिहर मज़दूरों या शहरों-कस्बों में अस्थाई लेबरी करने वालों के लिए नहीं होने जा रहा है!

दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये उद्योग पूँजी-केंद्रित हैं और/या ज़्यादातर कुशल मज़दूरों को ही रखते हैं (इसीलिए रोजगार बहुत ही कम बढ़ने की गुंजाइश होती है, खास कर इसलिए भी कि देश के अपने अद्योगों में काफ़ी उठा-पटक और विस्थापन होना तय है). विदेशों से आने वाले निवेश से रोजगार इसी कारण नहीं बढ़ पाएगा कि इन विदेशी कंपनियों ने अपने यहाँ ऐसी ही उत्पादन-प्रक्रिया विकसित कर ली है जिसमें पूँजी-श्रम अनुपात उन्हीं विकसित पूँजीवादी देशों के हिसाब से हो. इसके अलावा चूँकि इस तरह के निवेश उच्च स्तर की कुशलता का प्रयोग करते हैं, इसलिए आमदनी की विषमता का बढ़ना तय है.

हम ऐसे दुष्चक्र में फँसे हैं जहाँ पूरी अर्थव्यवस्था की पुनर्रचना और दिशा कुछ ही वर्गों के हित में बदलती जा रही है. यही नहीं, भाजपा शासन योजनाबद्ध तरीके से श्रम कानूनों से लेकर मनरेगा तक सामाजिक सहायता के सभी कार्यक्रमों को ठप कर रहा है. ग़रीबों के उत्थान के कार्यक्रम गायब होते जा रहे हैं और उनकी आमदनी और भी कम होती जा रही है. एक ओर जिस अतिरिक्त श्रम की बात होती है वह कृषि में ही बेरोज़गार पड़ा रहता है, तो दूसरी ओर शहरों में अस्थाई लेबरी करने वाले और ठेका मज़दूरी करने वाले लोग अर्थव्यवस्था के हाशिये पर पड़े रह जाते हैं. उनके श्रम का शोषण भी जारी ही रहता है.

संकुचित आधार वाली निर्यातोन्मुख वृद्धि की सीमाएँ और बाध्यताएँ:

यह देखने के बाद कि कैसे ‘मेक इन इंडिया’ और उसके समानांतर चलने वाली रणनीतियाँ समाज के ऊपरी तबकों को लाभ पहुँचाती हैं जबकि ग़रीब और कमज़ोर तबके हाशिये पर फेंक दिये जाते हों, उन बातों को भी समझने की ज़रूरत है जिनके कारण विकास के इस रास्ते की विफलता तय हैं:

1.देश की आंतरिक/घरेलु मांग का बाधित रहना तय है (इसलिए कि आबादी के बड़े हिस्से की आमदनी कहीं से भी बढ़ नहीं पाती है). विश्वव्यापी मंदी के वातावरण में भारत से निर्यात के लिए तैयार किये जाने वाले माल के लिए विकसित देशों की ओर से मांग भी कम रहने वाली है. रिज़र्व बैंक के प्रमुख इसी की ओर इशारे कर चुके हैं.

2.बुनियादी संरचना (इन्फ़्रास्ट्रक्चर) की कमी दूर नहीं होने वाली है. सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पी.पी.पी.) मॉडल पहले ही पूरी तरह बेकार सिद्ध हो चुका है. बुनियादी संरचना के मामले में जो समस्या सचमुच देश के सामने खड़ी है उसका समाधान होने की कोई संभावना दिखायी नहीं देती है.

3.विश्व से पूँजी आकर्षित करने के लिए भारतीय राज्य को अपने यहाँ विनिर्माण की लागत कम करने के लिए विशेष उपाय करने पड़ रहे हैं. पूँजी को सस्ता श्रम और प्राकृतिक संपदा उपलब्ध कराना पड़ रहा है. हाल में श्रम कानूनों में जो परिवर्तन किये गये, भूमि अधिग्रहण कानून में जो फेरबदल किये गये और पर्यावरणीय पहलुओं को लेकर हरी झंडी देने के जो उदाहरण देखे गये हैं, उन सबसे यह बात स्पष्ट है. इन उपायों के खिलाफ सामाजिक प्रतिरोध का उठना लाजिमी है.

4.दूसरे विकासशील देश भी कम लागत वाले विनिर्माण-स्थल बनवाने की होड़ में लगे हुए हैं. ऐसी स्थिति में एक ओर निवेश आकर्षित करने लायक वातावरण कायम रखने और दूसरी ओर विरोध में उठने वाले प्रतिरोध और सामाजिक संघर्षों को दबाते जाने के लिए यहाँ की राज्य सत्ता को बहुत अधिक चुस्ती से काम करना पड़ेगा.

‘मेक इन इंडिया’ को जिस तरह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नायाब और निर्णायक मोड़ बताया जा रहा है, ऐसा वह है नहीं. यह 1990 के दशक से उभर आयी नीतियों को ही अधिक तीखा बना रहा है. उसी नीति को अधिक खुली, अधिक नग्न, अधिक डंका पीटने वाली बना रहा है. सफल हो या न हो, यह तय है कि यह रणनीति ग़रीबों और कमज़ोरों को बड़ी तेज़ी के साथ आर्थिक तौर पर हाशिये पर फेंक देगी.

(लैला गौतम की पुस्तक “मेक इन इंडिया: आर्थिक रणनीति का आलोचनात्मक अध्ययन” उपरोक्त बातों का एक स्त्रोत है).
मगर हमारे देश की जनता के विभिन्न तबकों के मन में कई सारे सवाल हैं. वे शासक वर्ग की मौजूदा विकास योजना के आलोचकों के सामने कुछ सवाल रखना चाहते हैं. जनता के जीवन और आजीविका से जुड़े होने के कारण ये सवाल सच्चे सवाल हैं. पूँजीवादी विकास के मॉडल की आलोचना करने वालों को इन सवालों पर ग़ौर करना होगा और साफ़-साफ़ जवाब भी देने होंगे.

ये हैं ‘मेक इन इंडिया’ के आलोचकों के सामने खड़े कुछ सवाल:

1.प्रिय आलोचकगण, आप मेक इन इंडिया की योजना का विरोध क्यों कर रहे हैं, इसका आप खुलासा कर चुके हैं. यह अच्छी बात है. विकास की सारी योजनाओं को शोषणकारी और बेकार बताकर आलोचना करना व निंदा करना बहुत आसान होता है. लेकिन, यह बताइए, विकास की किसी योजना के बिना लोगों के लिए कमाने लायक और इज़्ज़त से जी पाने लायक रोजगार के अवसर कैसे पैदा किये जा सकते हैं? क्या विकास का कोई और विकल्प है जिसे लोग पसंद कर सकें और अपना सकें?

2.देश में हमारी तरह काम की तलाश में, नौकरी की खोज में घूम रहे साक्षर, अर्द्ध-साक्षर और निरक्षर लोग करोड़ों की तादाद में हैं. कोई विकास परियोजना न हो, विनिर्माण के कारखाने न हों और ठीक-ठाक बुनियादी संरचना न हो, तो इन करोड़ों लोगों को नौकरी कहाँ से और कैसे मिल पाएगी?

3.आप कहते हैं कि ज़मीन और संसाधन जस के तस रहने चाहिए, जंगल और खनिज जस के तस रहने चहिए. फिर हम लोगों को रोज़गार दे सकने वाला औद्योगिक वातावरण कैसे तैयार हो पाएगा?

4.आप कहते हैं कि आधुनिक तकनोलॉजी शोषणकारी है, यह कहते हैं कि निजी पूँजी का निवेश आमंत्रित नहीं करना चाहिए. पूँजी निवेश के बिना, विदेशी सहायता व सहयोग के बिना किसी राष्ट्र के लिए अपनी विशाल आबादी की भूख मिटाना क्या संभव है?

5.क्या यह सच नहीं है कि व्यक्तियों के बीच, व्यवसायों के बीच, संस्थाओं और उत्पादन करने वाले उद्यमों के बीच स्वस्थ प्रतियोगिता से लोगों को न्यूनतम नौकरशाही के साथ बेहतर सेवाएँ दी जा सकती है?

6.क्या यह व्यापक समाज के हित की बात नहीं है कि बाज़ार-तंत्र के ज़रिये समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप अद्यमिता की भावना, खोज व सुधार करने की भावना और संसाधनों के सृजनात्मक प्रबंधन की भवना को बढ़ावा दिया जाए?

आइए, देखते हैं कि इन सवालों के जवाब में शासक वर्ग की विकास नीतियों की आलोचना करने वाले लोग क्या कहते हैं?
सबसे पहले व्यक्ति और समाज और दोनों के बीच के संबंध के बारे में हमारे विचार स्पष्ट किये जाने चाहिए.
दूसरे, मुनाफ़े के लिए उत्पादन और व्यक्ति के मालिकाने पर विचार स्पष्ट किये जाने चाहिए. सामाजिक आवश्यकताओं के लिए उत्पादन और समाज के हितों की सेवा करने वाले उपकरण के रूप में बाज़ार-तंत्र के बारे में विचार स्पष्ट किये जाने चाहिए.
तीसरे, इस बात पर विचार स्पष्ट किये जाने चाहिए कि बाज़ार एक शोषणकारी, अराजक अव्यवस्था है, एक साम्राज्यवादी दानव है.

चौथे, इस बात पर विचार स्पष्ट किये जाने चाहिए कि वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन व वितरण ऐसी सामाजिक योजना के तहत हो जो किसी काल विशेष में समाज के विभिन्न पहलुओं का ध्यान रखते हुए बनायी गयी हो, जैसे: समाज के अलग-अलग तबकों के बीच मौजूद विषमताएँ, प्रचलित सामाजिक बुराइयाँ व अमानवीय रूढ़ियाँ, सामाजिक परिवेश और कुदरती पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले क्रिया-कलाप, समाज की विभिन्न परतों के बीच आर्थिक व सामाजिक असामानताएँ, और इन सभी मसलों को हल करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर उपाय करते हुए उत्पादन के साधनों पर अपना मालिकाना, नियंत्रण और प्रबंधन स्थापित करने वाले मेहनतकश वर्ग के समर्पित, राजनीतिक नेतृत्व के ज़रिये न्यायपूर्ण एवं समतामूलक समाज का निर्माण हो सके.

पाँचवें, विकास की परिभाषा पर सोच बिल्कुल साफ़ की जानी चाहिए. विकास किसके लिए हो? क्या विकास निजी पूँजी के लिए हो? या विकास समुदायों और समाज के लिए हो? विकास सामाजिक सौहार्द और पर्यावरण संरक्षण के लिए हो या धन और दुनिया के संसाधनों पर एकाधिकार कायम करने के लिए हो? क्या विकास समुदायों और राष्ट्रों के बीच विषमताएँ बढ़ाकर टकराव, जंग, विध्वंस, विस्थापन, घरों से बेदखली और मौत पैदा करने वाला हो?

छठे, हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि पूँजी के आगमन और मानव समाज में चंद लोगों के पास शोषण से अर्जित किया जाने वाला धन संचित होने से पहले लोग सामाजिक कम्यूनों के रूप में रहा करते थे. इतिहास में एक लंबे कालखंड तक सामुदायिक उत्पादन, विनिमय और वितरण कायम रहा है. कम्यून समाज आदिम रूप का समाज क्यों न रहा हो, वह न्यायपूर्ण, सामंजस्यपूर्ण, शांतिपूर्ण और कुदरत व पर्यावरण के साथ सामंजस्य कायम किया हुआ समाज था. वह व्यवस्था निश्चित रूप से इस वर्तमान व्यवस्था से बेहतर थी, जहाँ कि मनुष्य मनुष्य पर टूट पड़ता हो, व्यर्थ प्रतियोगिता जिसका आधार हो और चारों तरफ़ स्वार्थपरक लोभ और भोंडा उपभोक्तावाद ही हो. इस वर्तमान व्यवस्था को उखाड़ फेंककर कम्यूनों के सदाचार व सद्‍व्यवहार को दुबारा स्थापित कर इस धरती के सभी जीवों के अनुकूल और स्वयं धरती के जीवन के अनुकूल बनाने की ज़रूरत है.

जी हाँ, भारत की जनता के पास व्यावहारिक विकल्प है. विकल्प है जन विकास! ऐसा विकास जो शासक वर्ग के पूँजीवादी मॉडल के ठीक उलट है. जन विकास का मॉडल पर्यावरण के पक्ष में है, जनता के दिलोदिमाग़ के कहीं ज़्यादा क़रीब है. यही वजह है कि इस मॉडल के निर्माता बुनियादी मेहनतकश वर्ग के लोग हैं, वे जो सामाजिक रूप से ज़रूरी भोजन और कृषि उत्पादों का उत्पादन करते आये हैं, समाज के विभिन्न तबकों व समुदायों को अपनी-अपनी ज़रूरत के अनुसार तमाम सारी वस्तुएँ बनाकर देते रहे हैं, तमाम सेवाएँ प्रदान करते रहे हैं – इस मार्गदर्शक समझ के तहत कि “जनता की सेवा करें, समाज की सेवा करें!” जन विकास का यह मॉडल समाज के ऊपरी तबकों की ओर झुका मॉडल नहीं है. इसके ठीक उलट है. यह मॉडल नीचे से लेकर ऊपर की ओर देता जाता है. यह लोक-भागीदारी के आधार पर काम करने वाला जनतांत्रिक मॉडल है. यह पूँजीवादी परजीवियों और साम्राज्यवादी दानवों का तानाशाह शासन नहीं लादता है.

जन विकास का मॉडल और “मेक इन इंडिया”:
जन विकास का मॉडल यह ऐलान करता है कि –
मेक इन इंडिया कॉर्पोरेट लुटेरों और साम्राज्यवादियों के लिए न हो.
मेक इन इंडिया जनता की बेहतरी के लिए हो.
मेक इन इंडिया विस्थापन पैदा करने, विध्वंस करने, घरबार से बेदखल करने, साधन-संसाधनों से वंचित कर देने, कर्ज़ में डुबा देने, पूँजी की तानाशाही लादने, मौत को वुलाने वाला न हो.

मेक इन इंडिया तमाम सारे समुदायों व राष्ट्रीयताओं के न्यायपूर्ण, समतामूलक, सौहार्दपूर्ण सामाजिक जीवन के लिए हो.
मेक इन इंडिया भारतीय जनता की राष्ट्रीय योजना के अंतर्गत और उसके साथ तालमेल कायम करते हुए स्थानीय व क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप खेती, दस्तकारी, छोटे व मध्यम दर्ज़े के उद्योगों के रूप में संगठित जनता की सीधी भागीदारी से समुदाय के संसाधनों व संपदा के प्रबंधन के ज़रिये ज़मीनी स्तर का नियोजन करने के लिए हो.

मेक इन इंडिया चुने हुए कम्यूनों के माध्यम से जनता के मालिकाने पर आधारित और जनता के प्रबंधन से संचालित सहकारिताओं की समेकित व सामाजिक रूप से संगठित उत्पादन व वितरण श्रृंखलाओं के रूप में हो.

मेक इन इंडिया स्थानीय स्तर की सभी प्रतिभाओं, कुशलताओं, परंपराओं व नयी खोज करने की कोशिशों को समाहित करता हो और सभी मेहनतकश महिलाओं, पुरुषों, बूढ़ों व जवानों की भागीदारी पर आधारित हो, ताकि सभी के जीवन में सामाजिक सौहार्द और स्वच्छता व हरियाली रह सके और पर्यावरण व धरती को संरक्षित करने की ज़रूरत का पूरा-पूरा ध्यान रखा जा सके.

आदिवासी, खेत मज़दूर, काश्तकार किसान, छोटी खेती करने वाले किसान, औद्योगिक मज़दूर, निर्माण मज़दूर, असंगठित सेवा क्षेत्र के कर्मचारी, ठेका मज़दूर, भारतीय समाज के सभी उत्पीड़ित तबकों से आने वाले मेहनतकश लोग, कॉरपोरेट-विरोधी व जन-पक्षधर बुद्धिजीवी अपनी बेड़ियों को तोड़ते हुए विराट सैलाब बन ध्वस्त करेंगे अपने नंबर एक दुश्मन को: ठेकेदार-कॉरपोरेट-साम्राज्यवादी माफ़िया के हितों की सेवा कर रहे भारतीय समाज के मौजूदा ‘अर्ध-सामंती, अर्ध-औपनिवेशिक’ ढाँचे और उसके राज को. एकजुट होकर भारत की मेहनतकश जनता जन विकास के अपने मॉडल के अनुरूप सचमुच के लोकतांत्रिक भारत का निर्माण करेंगे और इसी मॉडल का अविभाज्य अंग होगा इस देश की मेहनतकश जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति करने वाला ‘मेक इन इंडिया’!
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1 Comment »

One Response to “मेक इन इंडिया – किसके लिए? किसके द्वारा?”

  1. Vineeta Says:
    July 2nd, 2017 at 03:42

    Sir
    Superb write up..

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